एक प्रेम से भरी बात
एक दलील
इस पवित्र पुस्तक में अल्लाह ने हमारी बुद्धि को अपील करने के लिए बहुत सी दलीलें दी हैं। एक उदाहरण यह है कि-
पालनहार का साझी बनाना सबसे बड़ा गुनाह
अँधेरी दुनिया की किरणजब दुनिया घनघोर अंधेर में डूबी हुई थी ज़ुल्म, हत्या, चोरी चकारी, अपशगुन, मासूम बेटियों को जिंदा ज़मीन में गाड़ देना एवं इन जैसी अनेक और अनगिनत बुराइयाँ और महा पाप आम हो गया था, एवं एक अल्लाह के बजाए अनेक प्राणी एवं जीव जंतुओं की पूजा की जाने लगी थी उस वक़्त अल्लाह ने अपने रसूल (दूत) मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को दुनिया को इन बुराइयों से पाक करने और मनुष्यता को ज़ुल्म और पाप से निकालने के लिए एवंम मनुष्य को एक अल्लाह की पूजा के लिए बुलाने की खातिर अंतिम संदेष्ठा के रूप में भेजा ! जिन्होंने अपने दायित्व को पूर्ण रूप से पूरा किया और दुनिया को पाप और ज़ुल्म के अँधेरे से निकल कर पुण्य और न्याय के मार्ग पर चलने के लिए उनका पूर्ण रूप से मार्गदर्शन किया, फिर देखते ही देखते सम्पूर्ण विश्व इस किरन के उज्यारों से भर गया.
मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने दुनिया को शांन्ति एवं सौहार्द की ऐसी शिक्षा दी कि उस से पूर्व किसी भी धर्म अथवा संस्कृति ने नहीं दी, और न हीं उसके बाद ही किसी ने ऐसी शिक्षा पेश की।
यह एक बहुमूल्य सत्य है कि हर आने वाले रसूल और नबी की ज़बान से और उस पर अल्लाह की ओर से उतारे गए विशेष सहीफ़ों में एक अन्तिम दूत की भविष्यवाणी की गयी है और यह कहा गया है कि उनके आने के बाद और उनको पहचान लेने के बाद सारी पुरानी शरीअतें (विधान) और धार्मिक क़ानून छोड़ कर उनकी बात मानी जाए और उनके द्वारा लाए गए अन्तिम कलाम (कुरआन) और सम्पूर्ण दीन पर चला जाए। यह भी इस्लाम की सच्चाई का सबूत है कि पिछली किताबों में बहुत अधिक हेर फेर के बावजूद उस मालिक ने अन्तिम दूत मुहम्मद (सल्ल.) के आने की सूचना को परिवर्तित न होने दिया, ताकि कोई यह न कह सके कि हमें तो कुछ ख़बर ही न थी।
मुहम्मद (सल्ल.) की पवित्र जीवनी का परिचय
उन दिनों वहाँ अल्लाह के घर काबा में 360 बुत, देवी देवताओं, बुजुर्गों व रसूलों की मूर्तियां रखी हुई थीं। पूरे अरब देश में बहुदेववाद (शिर्क) और कुफ़्र के अलावा हत्या, मारधाड़, लूटमार, गुलामों और औरतों के अधिकारों का हनन, उँच-नीच, धोखाधड़ी, शराब, जुआ, सूद, निराधार बातों पर युद्ध, ज़िना (व्यभिचार) जैसी न जाने कितनी बुराईयां फैली हुई थीं।
मनुष्य की एक और कमजोरी
सच्चा दीन केवल एक हैं। वह आरंभ ही से एक है। इसलिए उस एक को मानना और उसी एक की मानना इस्लाम है। दीन कभी नहीं बदलता, केवल शरीअतें समय के अनुसार बदलती रहीं हैं और वह भी उसी मालिक के बताए हुए तरीके़ पर। जब मनुष्य की नस्ल एक है और उनका मालिक एक है तो रास्ता भी केवल एक है। कुरआन कहता है-
ईमान की ज़रूरत
ईमान लाने के बाद
यह बात करने की नहीं, मगर मेरी इच्छा है कि मेरी इन प्रेम भरी बातों को आप प्यार की आँखों से देखें और पढ़ें। उस स्वामी के बारे में जो सारे संसार को चलाने और बनाने वाला है, सोच विचार करें, ताकि मेरे मन और मेरी आत्मा को शान्ति मिले कि मैंने अपने भाई या बहन की अमानत उस तक पहुँचाई और अपने मनुष्य और भाई होने का कर्तव्य पूरा किया।
इस संसार में आने के बाद एक मनुष्य के लिए जिस सच्चाई को जानना और मानना आवश्यक है और जो इसकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी और कर्तव्य है वह प्रेम भरी बात में आपको सुनाना चाहता हूँ।
प्रकृति का सबसे बड़ा सच
इस संसार, बल्कि प्रकृति की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि इस संसार में सारे जीवों और पूरी कायनात को बनाने वाला, पैदा करने वाला और उसका प्रबन्ध करने वाला केवल और केवल एक अकेला स्वामी है। वह अपनी ज़ात, गुण और अधिकारों में अकेला है। दुनिया को बनाने, चलाने, मारने और जिलाने में उसका कोई साझी नहीं। वह एक ऐसी शक्ति है जो हर जगह मौजूद है। हरेक की सुनता है हरेक को देखता है। सारे संसार में एक पत्ता भी उसकी आज्ञा के बिना हिल नहीं सकता। हर मनुष्य की आत्मा उसकी गवाही देती है, चाहे वह किसी भी धर्म का मानने वाला हो मगर अंदर से वह विश्वास रखता है कि पैदा करने वाला, पालने वाला, पालनहार और असली मालिक तो केवल वही एक है।
इंसान की बुद्धि में भी इसके अलावा और कोई बात नहीं आती कि सारे संसार का स्वामी एक ही है।
एक दलील
इस पवित्र पुस्तक में अल्लाह ने हमारी बुद्धि को अपील करने के लिए बहुत सी दलीलें दी हैं। एक उदाहरण यह है कि-‘‘यदि धरती और आकाशों में अल्लाह के अलावा स्वामी और शासक होते तो इन दोनों में बड़ा बिगाड़ और उत्पात मच जाता।’’ (अनुवाद कुरआन, अम्बिया 21:22)
बात स्पष्ट है। यदि एक के अलावा कई शासक व स्वामी होते तो झगड़ा होता।
सच यह है कि दुनिया की हर चीज़ गवाही दे रही है, यह संगठित रुप से चलती हुई कायनात की व्यवस्था गवाही दे रही है कि संसार का स्वामी अकेला और केवल एक है। वह जब चाहे और जो चाहे कर सकता है। उसे कल्पना एवं विचारों में क़ैद नहीं किया जा सकता। उसकी तस्वीर नहीं बनाई जा सकती। उस स्वामी ने सारे संसार को मनुष्यों के फ़ायदे और उनकी सेवा के लिए पैदा किया है। सूरज मनुष्य का सेवक, हवा मनुष्य की सेवक, यह धरती भी मनुष्य की सेवक है। आग, पानी, जानदार और बेजान दुनिया की हर वस्तु मनुष्य की सेवा के लिए बनायी गयी है। और उस स्वामी ने मनुष्य को अपना दास बना कर उसे अपनी उपासना करने और आदेश मानने के लिए पैदा किया है, ताकि वह इस दुनिया के सारे मामलों को सुचारु रुप से पूरा करे और इसी के साथ उसका स्वामी व उपास्य उससे प्रसन्न व राज़ी हो जाए।
एक बड़ी सच्चाई
उस सच्चे स्वामी ने अपनी सच्ची पुस्तक कुरआन में बहुत सी सच्चाई में से एक सच्चाई हमें यह बतायी है-
‘‘हर जीवन को मौत का स्वाद चखना है फिर तुम सब हमारी ही ओर लौटाए जाओगे।’’ (अनुवाद कुरआन, अन्कबूत 29:57)
इस आयत के दूसरे भाग में क़ुरआन एक और बड़ी सच्चाई की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करता है। यदि वह मनुष्य की समझ में आ जाए तो सारे संसार का वातावरण बदल जाए। वह सच्चाई यह है कि तुम मरने के बाद मेरी ही ओर लौटाए जाओगे और इस संसार में जैसा काम करोगे वैसा ही बदला पाओगे।
- सच्ची बात यह है कि हक़ीकत मरने के बाद हर मनुष्य के सामने आ जाएगी कि मनुष्य मरने के बाद अपने पैदा करने वाले स्वामी के पास जाता है और उसने उस संसार में जैसे काम किए होंगे, उसके हिसाब से प्रलय में इनाम पाएगा। यदि मनुष्य अपने पालनहार की उपासना और उसकी बात मानते हुए अच्छे काम करेगा, भलाई और सदाचार के रास्ते पर चलेगा तो वह अपने पालनहार की कृपा से जन्नत में जाएगा, जहाँ आराम की हर वस्तु है, जिनको इस दुनिया में न किसी आँख ने देखा न किसी कान ने सुना न किसी दिल में उनका विचार आया। इसी तरह जो लोग बुरे काम करेंगे अपने पालनहार के साथ दूसरों को भागी बनाएंगे और विद्रोह करके अपने स्वामी के आदेश का इन्कार करेंगे। उनको उनके बुरे कामों और अपराधों का सबसे बडा दंड यह होगा कि वे अपने स्वामी को देखने से वंचित रह जाएंगे
पालनहार का साझी बनाना सबसे बड़ा गुनाह
उस सच्चे असली स्वामी ने अपनी किताब कुरआन में हमे बताया कि भलाइयां और सदकर्म छोटे भी होते हैं और बडे़ भी। इसी तरह उस स्वामी के यहाँ अपराध, पाप और बुरे काम भी छोटे बडे़ होते हैं। उसने हमें बताया है कि जो अपराध व पाप मनुष्य को सबसे अधिक और भयानक दण्ड का भोगी बनाता है।
वह अपराध इस अकेले ईश्वर, पालनहार के साथ, उसके गुणों व अधिकारों में किसी को भागीदार बनाना है, इसके अलावा किसी दूसरे के आगे अपना सिर या माथा टेकना है और किसी और को पूजा योग्य मानना, मारने वाला, जीवित करने वाला, आजीविका देने वाला, लाभ व हानि का मालिक समझना बहुत बडा पाप और अत्यन्त ऊँचें दर्जे का जुल्म है, चाहे ऐसा किसी देवी देवता को माना जाए या सूरज चांद, सितारे को, किसी को भी उस एक मात्रा स्वामी के गुणों में बराबर का या भागीदार समझना शिर्क (बहुदेववाद) है, जिसे वह स्वामी क्षमा नहीं करेगा। इसके अलावा किसी भी गुनाह को यदि वह चाहे तो माफ़ कर देगा।
जिस प्रकार एक वैश्या अपनी इज़्ज़त व सतीत्व बेच कर हर आने वाले आदमी को अपने ऊपर क़ब्ज़ा दे देती है तो इसी कारण वह हमारी नज़रों से गिरी हुई रहती है, तो वह आदमी भी अपने स्वामी की नज़रों में इससे कहीं अधिक नीच, अपमानित और गिरा हुआ है, जो उसे छोड कर किसी दूसरे की उपासना में मस्त हो, चाहे वह कोई देवता हो या मनुष्य, मूर्ति हो या बुत हो या स्थान या कोई दूसरी काल्पनिक वस्तु।
सबसे बड़ा सदकर्म ईमान है
इसी प्रकार सबसे बड़ा सदकर्म ‘‘ईमान’’ है, जिसके बारे में दुनिया के समस्त धर्म वाले यह कहते हैं कि सब कुछ यहीं छोड़ जाना है, मरने के बाद आदमी के साथ केवल ईमान जाएगा। मनुष्य पर सबसे बड़ा हक़ उसके पैदा करने वाले का है। वह यह कि सबको पैदा करने वाला, जीवन और मृत्यु देने वाला स्वामी, पालनहार और उपासना के योग्य केवल अकेला अल्लाह है, तो फिर उसी की उपासना की जाए, उसी को स्वामी, लाभ हानि, सम्मान व अपमान देने वाला समझा जाए और उसके दिए हुए जीवन को उसकी इच्छा व आज्ञा अनुसार बसर किया जाए। उसी को माना जाए और उसी की मानी जाए। इसी का नाम ईमान है।
ईमान केवल यह है कि मनुष्य अपने मालिक को अकेला माने, उस अकेले की उपासना और जीवन की हर घड़ी को मालिक की मर्ज़ी और उसके आदेशानुसार बसर करे। उसके दिए हुए जीवन को उसकी इच्छानुसार बसर करना ही दीन कहलाता है।
ईमान केवल यह है कि मनुष्य अपने मालिक को अकेला माने, उस अकेले की उपासना और जीवन की हर घड़ी को मालिक की मर्ज़ी और उसके आदेशानुसार बसर करे। उसके दिए हुए जीवन को उसकी इच्छानुसार बसर करना ही दीन कहलाता है।
सच्चा दीन
सच्चा दीन आरंभ से ही एक है और उसकी शिक्षा है कि उस अकेले ही को माना जाए और उसी का हुक्म भी माना जाए। अल्लाह ने कुरआन में कहा है-
‘‘इस्लाम के अलावा जो भी किसी और दीन को अपनाएगा वह अस्वीकार्य होगा और ऐसा व्यक्ति परलोक में हानि उठाने वालों में होगा।’’ (अनुवाद कुरआन, आले इमरान 3:85)
मनुष्य की कमज़ोरी है कि उसकी नज़र एक विशेष सीमा तक देख सकती है। उसके कान एक सीमा तक सुन सकते हैं, उसके सूंघने चखने और छूने की शक्ति भी सीमित है। इन पाँच इन्द्रियों से उसकी बुद्धि को जानकारी मिलती है, इसी तरह बुद्धि की पहुँच की भी एक सीमा है।
वह मालिक किस तरह का जीवन पसंद करता है? उसकी उपासना किस तरह की जाए? मरने के बाद क्या होगा? जन्नत किन लोगों को मिलेगी? वे कौन से काम हैं जिनके नतीजे में मनुष्य नरक में जाएगा? इन सारी बातों का पता मानव बुद्धि, सूझ बूझ और ज्ञान से नहीं लगाया जा सकता।
पैग़म्बर (सन्देष्टा)
मनुष्यों की इस कमज़ोरी पर दया करके उसके पालनकार ने अपने बंदों में से उन महान मनुष्यों पर जिनको उसने इस दायित्व के योग्य समझा, अपने फ़रिश्तों द्वारा उन पर अपना संदेश उतारा, जिन्होंने मनुष्य को जीवन बसर करने और उपासना के तौर तरीके़ बताए और जीवन की वे सच्चाईयाँ बतायीं जो वह अपनी बुद्धि के आधार पर नहीं समझ सकता था।
ऐसे बुज़ुर्ग और महान मनुष्य को नबी, रसूल या सन्देष्टा कहा जाता है। इसे अवतार भी कह सकते हैं बशर्ते कि अवतार का मतलब हो ‘‘वह मनुष्य, जिसे अल्लाह ने मनुष्यों तक अपना संदेश पहुँचाने के लिए चुना हो’’। लेकिन आज कल अवतार का मतलब यह समझा जाता है कि ईश्वर मनुष्य के रूप में धरती पर उतरा है। यह व्यर्थ विचार और अंधी आस्था है। यह महा पाप है। इस असत्य धारणा ने मनुष्य को एक मालिक की उपासना से हटाकर उसे मूर्ति पूजा की दलदल में फंसा दिया।
वह महान मनुष्य जिनको अल्लाह ने लोगों को सच्चा रास्ता बताने के लिए चुना और जिनको नबी और रसूल कहा गया, हर क़ौम में आते रहे हैं। उन सब ने लोगों को एक अल्लाह को मानने, केवल उसी अकेले की उपासना करने और उसकी इच्छा से जीवन बसर करने का जो तरीक़ा (शरीअत या धार्मिक क़ानून) वे लाए, उसकी पाबन्दी करने को कहा। इनमें से किसी संदेष्टा ने भी ईश्वर के अलावा अपनी या किसी और की उपासना की दावत नहीं दी, बल्कि उन्होंने उसे सबसे भयानक और बड़ा भारी अपराध ठहराते हुए सबसे अधिक इसी पाप से लोगों को रोका। उनकी बातों पर लोगों ने विश्वास कर लिया और सच्चे मार्ग पर चलने लगे।
रसूलों की शिक्षा
एक के बाद एक नबी और रसूल आते रहे, उनके धर्म का आधार एक होता। वे एक ही धर्म की ओर बुलाते कि एक ईश्वर को मानो, किसी को उसके वजूद और उसके गुणों व अधिकारों में साझी न ठहराओ, उसकी उपासना व आज्ञा पालन में किसी को भागीदार न करो, उसके रसूलों को सच्चा जानो, उसके फ़रिश्ते जो उसके बन्दे और पवित्र प्राणी हैं, जो न खाते पीते हैं न सोते हैं, हर काम में मालिक की आज्ञा का पालन करते हैं। उसकी अवज्ञा नहीं कर सकते। वे अल्लाह की ख़ुदाई या उसके मामलों में कण बराबर भी कोई दख़ल नहीं रखतें हैं उनके अस्तित्व को मानो। उसने अपने फ़रिश्ते द्वारा अपने रसूलों व नबियों पर जो वहां (ईश वाणी) भेजी या किताबें भेजीं, उन सबको सच्चा जानो, मरने के बाद दोबारा जीवन पाकर अपने अच्छे बुरे कामों का बदला पाना है, इस विश्वास के साथ इसे सत्य जानो और यह भी मानो कि जो कुछ भाग्य में अच्छा या बुरा है, वह मालिक की ओर से है और रसूल उस समय अल्लाह की ओर जो शरीअत (विधान) और जीवन व्यापन का तरीक़ा लेकर आया है, उस पर चलो और जिन बुराईयों और वर्जित कामों और वस्तुओं से उसने मना किया है, उनको न करो।
जितने अल्लाह के दूत आए सब सच्चे थे और उन पर जो पवित्र ईश वाणी उतरी, वह भी सच्ची थी। उन सब पर हमारा ईमान है और हम उनमें भेद नहीं करते। सत्य तो यह है कि जिन्होंने एक ईश्वर को मानने की दावत दी हो, उनकी शिक्षाओं में एक मालिक को छोड़ कर दूसरों की पूजा ही नहीं स्वयं अपनी पूजा की भी बात न हो, उनके सच्चे होने में क्या संदेह हो सकता है? अलबत्ता जिन महा पुरुषों के यहां मूर्ति पूजा या बहुत से उपास्यों की उपासना की शिक्षा मिलती है, या तो उनकी शिक्षाओं में परिवर्तन कर दिया गया है या वे अल्लाह के दूत ही नहीं हैं। मुहम्मद (सल्ल.) से पहले के सारे रसूलों के जीवन के हालात में हेर फेर कर दिया गया है और उनकी शिक्षाओं के बड़े हिस्से को भी परिवर्तित कर दिया गया है।
अँधेरी दुनिया की किरण
मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने दुनिया को शांन्ति एवं सौहार्द की ऐसी शिक्षा दी कि उस से पूर्व किसी भी धर्म अथवा संस्कृति ने नहीं दी, और न हीं उसके बाद ही किसी ने ऐसी शिक्षा पेश की।
अन्तिम दूत मुहम्मद (सल्ल.)
इन धार्मिक पुस्तकों में मुहम्म्द (सल्ल.) के जन्म स्थान, जन्म का युग और उनके गुणों व विशेषताओं आदि के बार में स्पष्ट इशारे दिए गए हैं।
मुहम्मद (सल्ल.) की पवित्र जीवनी का परिचय
अब से लगभग साढ़े चैदह-सौ साल पहले वह अन्तिम नबी व रसूल मुहम्मद (सल्ल.) सउदी अरब के प्रसिद्व शहर मक्का में पैदा हुए। जन्म से कुछ महीने पूर्व ही आपके बाप अब्दुल्लाह का देहान्त हो गया था। माँ आमना भी कुछ अधिक समय तक जीवित नहीं रहीं। पहले दादा अब्दुल मुत्तलिब और उनके देहान्त के बाद चाचा अबू तालिब ने उन्हें पाला। आप अपने गुणों, भलाईयों व अच्छाइयों के कारण शीघ्र ही सारे मक्का शहर की आँखों का तारा बन गए। जैसे-जैसे आप बडे़ होते गए, आप से लोगों का प्रेम बढ़ता गया। आपको सच्चा और ईमानदार कहा जाने लगा। लोग सुरक्षा के लिए अपनी बहुमुल्य वस्तुएं आपके पास रखते, अपने आपसी विवादों व झगड़ों का फै़सला कराते। लोग मुहम्मद (सल्ल.) को हर अच्छे काम में आगे पाते। आप वतन में हों या सफ़र में, सब लोग आपके गुणों के गुन गाते।
उन दिनों वहाँ अल्लाह के घर काबा में 360 बुत, देवी देवताओं, बुजुर्गों व रसूलों की मूर्तियां रखी हुई थीं। पूरे अरब देश में बहुदेववाद (शिर्क) और कुफ़्र के अलावा हत्या, मारधाड़, लूटमार, गुलामों और औरतों के अधिकारों का हनन, उँच-नीच, धोखाधड़ी, शराब, जुआ, सूद, निराधार बातों पर युद्ध, ज़िना (व्यभिचार) जैसी न जाने कितनी बुराईयां फैली हुई थीं। मुहम्मद (सल्ल.) जब 40 साल के हुए तो अल्लाह ने अपने फरिश्ते जिबरईल (अलैहि.) द्वारा आप पर कुरआन उतारना आरंभ किया और आपको रसूल बनाने की शुभ सूचना दी और लोगों को एक अल्लाह की उपासना व आज्ञा पालन की ओर बुलाने की ज़िम्मेदारी डाली।
मनुष्य की यह कमज़ोरी रही है कि वह अपने बाप दादा और बुजुर्गों की गलत बातों को भी आँख बन्द करके मानता चला जाता है, चाहे बुद्धि और तर्क उन बातों का साथ नहीं दे रहे हों, लेकिन इसके बावजूद मनुष्य पारिवारिक बातों पर जमा रहता है और इसके विरुद्ध अमल तो क्या, कुछ सुनना भी पसन्द नहीं करता।
बाधाएँ और आज़माइशें
यही कारण था कि 40 साल की आयु तक मुहम्मद (सल्ल.) का सम्मान करने और सच्चा मानने और जानने के बावजूद मक्का के लोग अल्लाह के सन्देष्टा के रूप में अल्लाह की ओर से लायी गयी आपकी शिक्षाओं के दुश्मन हो गए। आप जितना अधिक लोगों को सबसे बड़ी सच्चाई शिर्क के विरूद्ध एकेश्वरवाद की ओर बुलाते, लोग उतना ही आप के साथ दुश्मनी करते। कुछ लोग इस सच्चाई को मानने वालों और आपका साथ देने वालों को सताते, मारते और दहकते हुए अंगारों पर लिटा देते। गले में फंदा डाल कर घसीटते, उनको पत्थरों और कोड़ों से मारते, लेकिन आप सबके लिए अल्लाह से दुआ मांगते, किसी से बदला नहीं लेते, सारी सारी रात अपने मालिक से उनके लिए सीधे मार्ग पर आने की दुआ करते। एक बार आप मक्का के लोगों से निराश होकर निकट के शहर ताइफ़ गए। वहाँ के लोगों ने उस महान मनुष्य का घोर अपमान किया। आपके पीछे शरारती लड़के लगा दिए जो आपको बुरा भला कहते।
उन्होंने आपको पत्थर मारे, इस हाल में आप शहर से बाहर निकल कर एक जगह बैठ गए। आपने उनको बददुआ नहीं दी बल्कि अपने मालिक से प्रार्थना की कि ‘‘ऐ मालिक! इनको समझ दे, ये जानते नहीं।’’
इस पवित्र ईशवाणी और वहां पहुँचाने के कारण आपका और आपका साथ देने वाले परिवार और क़बीले का तीन वर्ष तक पूर्ण सामाजिक बहिष्कार किया गया। इस पर भी बस न चला तो आपके क़त्ल की योजना बनायी गयी। अन्त में अल्लाह के आदेश से आपको अपना प्यारा शहर मक्का छोड़ कर दूसरे शहर मदीना जाना पड़ा। वहाँ भी मक्का वाले सेना तैयार करके बार-बार आप से युद्ध करने के लिए धावा बोलते रहे।
अन्तिम वसीयत
अपनी मृत्यु से कुछ ही महीने पहले आपने लगभग सवा लाख लोगों के साथ हज किया और तमाम लोगों को अपनी अन्तिम वसीयत की जिसमें आपने यह भी कहा - ‘‘लोगों! मरने के बाद क़यामत में हिसाब किताब के दिन मेरे बारे में भी तुम से पूछा जाएगा कि क्या मैंने अल्लाह का संदेश और उसका दीन तुम तक पहुँचाया था तो तुम क्या जवाब दोगे?’’ सबने कहा- ‘‘निःसंदेह आपने इसे पूर्ण रुप से हम तक पहुँचा दिया, उसका हक़ अदा कर दिया।’’ आपने आसमान की ओर उंगली उठायी और तीन बार कहा- ‘‘ऐ अल्लाह! आप गवाह रहिए, आप गवाह रहिए, आप गवाह रहिए।’’ इसके बाद आपने लोगों से फ़रमाया- ‘‘यह सच्चा दीन जिन तक पहुँच चुका है वे उनको पहुँचाएँ जिनके पास नहीं पहुँचा है।’’
आपने यह भी ख़बर दी कि मैं अन्तिम रसूल हूँ। अब मेरे बाद कोई रसूल या नबी नहीं आएगा। मैं ही वह अन्तिम संदेष्टा हूँ। जिसकी तुम प्रतीक्षा कर रहे थे और जिसके बारे में तुम सब कुछ जानते हो।
कुरआन में है-
‘‘जिन लोगों को हमने किताब दी है, वे इस (पैग़म्बर मुहम्मद) को ऐसे पहचानते हैं जैसे अपने बेटों को पहचानते हैं। यद्यपि उनमें का एक गिरोह सत्य को जानते बूझते छुपाता है।’’ (अनुवाद कुरआन, बक़रा 2:46)
हर मनुष्य का दायित्व
अब क़यामत तक आने वाले हर मनुष्य पर यह अनिवार्य है और उसका यह धार्मिक और मानवीय कर्तव्य है कि वह उस अकेले मालिक की उपासना करे, उसी का आज्ञा पालन करे, उसके साथ किसी को साझी न ठहराए, क़यामत और दोबारा उठाए जाने, हिसाब किताब, जन्नत व जहन्नम को सच माने और इस बात को माने कि परलोक़ में अल्लाह मालिक होगा। वहाँ भी उसका कोई साझी न होगा।
सारे ईश्वरीय धर्मों और ईश्वरीय किताबों में अपने समय में सत्य और सच्चाई की शिक्षा दी जाती थी लेकिन अब उन समस्त रसूलों और ईश्वरीय किताबों को सच्चा मानते हुए भी सबसे अन्तिम रसूल मुहम्मद (सल्ल.) पर ईमान लाना और उनकी लाई हुई अन्तिम पुस्तक व शरीअत पर चलना हर मनुष्य के लिए आवश्यक है।
- जब बच्चा छोटा होता है उसे चित्रों वाली किताब पढ़ायी जाती है फिर थोड़ी आसान शब्दों की जब उसकी बुद्दि विकसित हो जाती है तब ऐसे किसी सहारे की जरूरत नहीं रहती.
- जब जादू टोने में लोगों को विश्वास था तब मूसा को किताब दी और साथ में जादूई लाठी, फिर ईसा को मुर्दा को जिन्दा करने की शक्ति देकर किताब भेजी.
- मानव जैसे जैसे मानव सभ्य और सुसंस्कार और बुद्धिमान होता गया वैसे वैसे वह उसको हिदायत करता रहा, कुरआन ने अपनी असल हिदायत को पिछली हिदायतों और किताबों ही का एक नया संस्करण कहा है। तीन किताबों को किताबे इलाही-आसमानी किताब अर्थात उसके (अल्लाह) द्वारा भेजी गयी मानता है।
ईसा ने पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बारे में फरमाया:
- "तुम्हारे लिए भला है कि मैं चला जाऊँ, क्योंकि यदि मैं न जाऊँ तो सहायक (फारक़लीत) तुम्हारे पास नहीं आयेगा। किन्तु यदि मैं चला जाता हूँ तो मैं उसे तुम्हारे लिए भेज दूँगा। और जब वह आयेगा तो पाप के विषय में जगत के संदेह दूर करेगा।
- मुझे अभी तुम से बहुत सी बातें करनी हैं किन्तु तुम अभी उन्हें सह नहीं सकते। किन्तु जब सत्य का आत्मा आयेगा तो वह तुम्हें पूर्ण सत्य की राह दिखायेगा; क्योंकि वह अपनी ओर से कुछ नहीं कहेगा। वह जो कुछ सुनेगा वही बतायेगा। और जो कुछ होने वाला है उसे प्रकट करेगा।"
यूहन्ना की इंजील 16:7-8, 12-13
- तौरात के अध्याय व्यवस्था विवरण 18 :18-19 में आया है कि "हे मूसा! मैं बनी इस्राईल के लिए उनके भाईयों ही में से तेरे समान एक नबी बनाऊँगा और अपने वचन (आदेश) को उसके मुँह में रख दूँगा। और वह उन से वही बात कहेगा जिसका मैं उसे आदेश दूँगा। जो आदमी उस नबी की बात नहीं मानेगा जो मेरे नाम पर बोलेगा तो मैं उस से और उसके क़बीले से इंतिक़ाम लूँगा।" ये शब्द आज तक उन की किताबों में मौजूद हैं, और उनके भाईयों में से कहा हैं जिसका मतलब है कि इस्माईल के बेटों में से।
सच्चा दीन केवल एक हैं। वह आरंभ ही से एक है। इसलिए उस एक को मानना और उसी एक की मानना इस्लाम है। दीन कभी नहीं बदलता, केवल शरीअतें समय के अनुसार बदलती रहीं हैं और वह भी उसी मालिक के बताए हुए तरीके़ पर। जब मनुष्य की नस्ल एक है और उनका मालिक एक है तो रास्ता भी केवल एक है। कुरआन कहता है-
‘‘दीन तो अल्लाह के निकट केवल इस्लाम ही है।’’ (अनुवाद कुरआन, आले इमरान 3:19)
एक और सवाल
कुरआन अल्लाह की वाणी है, उसने दुनिया को अपने सच्चे होने के लिए जो तर्क दिए हैं वे सबको मानने पड़े हैं और आज तक उनकी काट नहीं हो सकी। उसने मुहम्मद (सल्ल.) के अन्तिम नबी होने की घोषणा की है।मुहम्मद (सल्ल.) के पवित्र जीवन का एक एक पल दुनिया के सामने है। उनका सम्पूर्ण जीवन इतिहास की खुली किताब है। दुनिया में किसी भी मनुष्य का जीवन आपके जीवन की भांति सुरक्षित और इतिहास की रोशनी में नहीं है। आपके दुश्मनों और इस्लाम दुश्मन इतिहासकारों ने भी कभी यह नहीं कहा कि मुहम्मद (सल्ल.) ने अपने व्यक्तिगत जीवन में कभी किसी बारे में झूठ बोला हो। आपके शहर वाले आपकी सच्चाई की गवाही देते थे। जिस आदर्श मनुष्य ने अपने व्यक्तिगत जीवन में कभी झूठ नहीं बोला।
सारी धार्मिक पुस्तकों में अन्तिम ऋषि कलकी अवतार की जो भविष्य वाणियां की गयीं और निशानियाँ। बतायी गयी हैं, वे केवल मुहम्मद (सल्ल.) पर पूरी उतरती हैं।
सारी धार्मिक पुस्तकों में अन्तिम ऋषि कलकी अवतार की जो भविष्य वाणियां की गयीं और निशानियाँ। बतायी गयी हैं, वे केवल मुहम्मद (सल्ल.) पर पूरी उतरती हैं।
पंडित वेद प्रकाश उपाध्याय का निर्णय:
हिन्दुओं के धार्मिक ग्रन्थ वेदों में अंतिम अवतार और नराशंस के इस धरती पर आ जाने के बाद उनको और उनके दीन को मानने पर बल दिया गया है।
हिन्दुओं के धार्मिक ग्रन्थ वेदों में अंतिम अवतार और नराशंस के इस धरती पर आ जाने के बाद उनको और उनके दीन को मानने पर बल दिया गया है।ईमान की ज़रूरत
मरने के बाद के जीवन के अलावा इस संसार में भी ईमान हमारी ज़रूरत है और मनुष्य का कर्तव्य है कि एक स्वामी की उपासना और आज्ञापालन करे।
वह कैसा मनुष्य है, जो अपने सच्चे मालिक को भूल कर दर दर झुकता फिरे।
वह कैसा मनुष्य है, जो अपने सच्चे मालिक को भूल कर दर दर झुकता फिरे।
- अगर ये सच्ची बातें आपके दिल में घर कर गयी। तो आइए! सच्चे दिल और सच्ची आत्मा वाले मेरे प्रिय मित्र उस मालिक को गवाह बनाकर और ऐसे सच्चे दिल से जिसे दिलों का हाल जानने वाला मान ले, इक़रार करें और प्रण करें:
‘‘अशहदु अल्लाइलाह इल्लल्लाहु व अशहदु अन्न मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू’’
‘‘मैं गवाही देता हूँ इस बात की कि अल्लाह के सिवा कोई उपासना योग्य नहीं (वह अकेला है उसका कोई साझी नहीं) और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद अल्लाह के बन्दे और उसके रसूल (दूत) हैं’’।
दयावान और करीम मालिक मुझे और आपको इस रास्ते पर मरते दम तक जमाए रखे। आमीन!
आपका कर्तव्य
ईमान और इस्लाम की यह सच्चाई हर उस भाई का हक़ और अमानत है, जिस तक यह हक़ नहीं पहुँचा है, इसलिए आपका भी कर्तव्य है कि निःस्वार्थ होकर अल्लाह के लिए केवल अपने भाई की हमदर्दी में उसे मालिक के प्रकोप से बचाने के लिए दुख दर्द के पूरे अहसास के साथ जिस तरह अल्लाह के रसूल मुहम्मद (सल्ल.) ने उम्र भर यह सच्चाई पहुँचाई थी, आप भी पहुँचाएँ। उसको सही सच्चा रास्ता समझ में आ जाए। उसके लिए अपने मालिक से दुआ करें। कही बात दिल पर प्रभाव डालती है, इसलिए कि अल्लाह उस व्यक्ति से बहुत अधिक प्रसन्न होता है, जो किसी को कुफ़्र और शिर्क से निकाल कर सच्चाई के मार्ग पर लगा दे।
ईमान लाने के बाद
अब आपका सिर अल्लाह के अलावा किसी के आगे न झुके। सच्चे दिल से यह दुआ करनी है कि ऐ हमारे मालिक! हमको, परिवार के लोगों और रिश्तेदारों को, हमारे दोस्तों को और इस धरती पर बसने वाली तमाम मानवता को ईमान के साथ ज़िन्दा रख और ईमान के साथ इन्हें मौत दे। इसलिए कि ईमान ही मानव समाज का पहला और आखि़री सहारा है, जिस तरह अल्लाह के एक पैग़म्बर इब्राहीम (अलैहि.) जलती हुई आग में अपने ईमान की वजह से कूद गए थे और उनका एक बाल तक न जल सका था, आज भी उस ईमान की ताक़त आग को गुल व गुलज़ार बना सकती है और सच्चे रास्ते की हर रुकावट को ख़त्म कर सकती है।





