08 October, 2011

Truth and Wisdom

एक प्रेम से भरी बात
यह बात करने की नहीं, मगर मेरी इच्छा है कि मेरी इन प्रेम भरी बातों को आप प्यार की आँखों से देखें और पढ़ें। उस स्वामी के बारे में जो सारे संसार को चलाने और बनाने वाला है, सोच विचार करें, ताकि मेरे मन और मेरी आत्मा को शान्ति मिले कि मैंने अपने भाई या बहन की अमानत उस तक पहुँचाई और अपने मनुष्य और भाई होने का कर्तव्य पूरा किया।
  इस संसार में आने के बाद एक मनुष्य के लिए जिस सच्चाई को जानना और मानना आवश्यक है और जो इसकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी और कर्तव्य है वह प्रेम भरी बात में आपको सुनाना चाहता हूँ।

प्रकृति का सबसे बड़ा सच
इस संसार, बल्कि प्रकृति की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि इस संसार में सारे जीवों और पूरी कायनात को बनाने वाला, पैदा करने वाला और उसका प्रबन्ध करने वाला केवल और केवल एक अकेला स्वामी है। वह अपनी ज़ात, गुण और अधिकारों में अकेला है। दुनिया को बनाने, चलाने, मारने और जिलाने में उसका कोई साझी नहीं। वह एक ऐसी शक्ति है जो हर जगह मौजूद है। हरेक की सुनता है हरेक को देखता है। सारे संसार में एक पत्ता भी उसकी आज्ञा के बिना हिल नहीं सकता। हर मनुष्य की आत्मा उसकी गवाही देती है, चाहे वह किसी भी धर्म का मानने वाला हो मगर अंदर से वह विश्वास रखता है कि पैदा करने वाला, पालने वाला, पालनहार और असली मालिक तो केवल वही एक है।
इंसान की बुद्धि में भी इसके अलावा और कोई बात नहीं आती कि सारे संसार का स्वामी एक ही है।

एक दलील
इस पवित्र पुस्तक में अल्लाह ने हमारी बुद्धि को अपील करने के लिए बहुत सी दलीलें दी हैं। एक उदाहरण यह है कि-
‘‘यदि धरती और आकाशों में अल्लाह के अलावा स्वामी और शासक होते तो इन दोनों में बड़ा बिगाड़ और उत्पात मच जाता।’’ (अनुवाद कुरआन, अम्बिया 21:22)
बात स्पष्ट है। यदि एक के अलावा कई शासक व स्वामी होते तो झगड़ा होता।
सच यह है कि दुनिया की हर चीज़ गवाही दे रही है, यह संगठित रुप से चलती हुई कायनात की व्यवस्था गवाही दे रही है कि संसार का स्वामी अकेला और केवल एक है। वह जब चाहे और जो चाहे कर सकता है। उसे कल्पना एवं विचारों में क़ैद नहीं किया जा सकता। उसकी तस्वीर नहीं बनाई जा सकती। उस स्वामी ने सारे संसार को मनुष्यों के फ़ायदे और उनकी सेवा के लिए पैदा किया है। सूरज मनुष्य का सेवक, हवा मनुष्य की सेवक, यह धरती भी मनुष्य की सेवक है। आग, पानी, जानदार और बेजान दुनिया की हर वस्तु मनुष्य की सेवा के लिए बनायी गयी है। और उस स्वामी ने मनुष्य को अपना दास बना कर उसे अपनी उपासना करने और आदेश मानने के लिए पैदा किया है, ताकि वह इस दुनिया के सारे मामलों को सुचारु रुप से पूरा करे और इसी के साथ उसका स्वामी व उपास्य उससे प्रसन्न व राज़ी हो जाए।

एक बड़ी सच्चाई
उस सच्चे स्वामी ने अपनी सच्ची पुस्तक कुरआन में बहुत सी सच्चाई में से एक सच्चाई हमें यह बतायी है-
‘‘हर जीवन को मौत का स्वाद चखना है फिर तुम सब हमारी ही ओर लौटाए जाओगे।’’ (अनुवाद कुरआन, अन्कबूत 29:57)
  इस आयत के दूसरे भाग में क़ुरआन एक और बड़ी सच्चाई की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करता है। यदि वह मनुष्य की समझ में आ जाए तो सारे संसार का वातावरण बदल जाए। वह सच्चाई यह है कि तुम मरने के बाद मेरी ही ओर लौटाए जाओगे और इस संसार में जैसा काम करोगे वैसा ही बदला पाओगे।
  • सच्ची बात यह है कि हक़ीकत मरने के बाद हर मनुष्य के सामने आ जाएगी कि मनुष्य मरने के बाद अपने पैदा करने वाले स्वामी के पास जाता है और उसने उस संसार में जैसे काम किए होंगे, उसके हिसाब से प्रलय में इनाम पाएगा। यदि मनुष्य अपने पालनहार की उपासना और उसकी बात मानते हुए अच्छे काम करेगा, भलाई और सदाचार के रास्ते पर चलेगा तो वह अपने पालनहार की कृपा से जन्नत में जाएगा, जहाँ आराम की हर वस्तु है, जिनको इस दुनिया में न किसी आँख ने देखा न किसी कान ने सुना न किसी दिल में उनका विचार आया। इसी तरह जो लोग बुरे काम करेंगे अपने पालनहार के साथ दूसरों को भागी बनाएंगे और विद्रोह करके अपने स्वामी के आदेश का इन्कार करेंगे। उनको उनके बुरे कामों और अपराधों का सबसे बडा दंड यह होगा कि वे अपने स्वामी को देखने से वंचित रह जाएंगे

पालनहार का साझी बनाना सबसे बड़ा गुनाह
उस सच्चे असली स्वामी ने अपनी किताब कुरआन में हमे बताया कि भलाइयां और सदकर्म छोटे भी होते हैं और बडे़ भी। इसी तरह उस स्वामी के यहाँ अपराध, पाप और बुरे काम भी छोटे बडे़ होते हैं। उसने हमें बताया है कि जो अपराध व पाप मनुष्य को सबसे अधिक और भयानक दण्ड का भोगी बनाता है।
  वह अपराध इस अकेले ईश्वर, पालनहार के साथ, उसके गुणों व अधिकारों में किसी को भागीदार बनाना है, इसके अलावा किसी दूसरे के आगे अपना सिर या माथा टेकना है और किसी और को पूजा योग्य मानना, मारने वाला, जीवित करने वाला, आजीविका देने वाला, लाभ व हानि का मालिक समझना बहुत बडा पाप और अत्यन्त ऊँचें दर्जे का जुल्म है, चाहे ऐसा किसी देवी देवता को माना जाए या सूरज चांद, सितारे को, किसी को भी उस एक मात्रा स्वामी के गुणों में बराबर का या भागीदार समझना शिर्क (बहुदेववाद) है, जिसे वह स्वामी क्षमा नहीं करेगा। इसके अलावा किसी भी गुनाह को यदि वह चाहे तो माफ़ कर देगा।
जिस प्रकार एक वैश्या अपनी इज़्ज़त व सतीत्व बेच कर हर आने वाले आदमी को अपने ऊपर क़ब्ज़ा दे देती है तो इसी कारण वह हमारी नज़रों से गिरी हुई रहती है, तो वह आदमी भी अपने स्वामी की नज़रों में इससे कहीं अधिक नीच, अपमानित और गिरा हुआ है, जो उसे छोड कर किसी दूसरे की उपासना में मस्त हो, चाहे वह कोई देवता हो या मनुष्य, मूर्ति हो या बुत हो या स्थान या कोई दूसरी काल्पनिक वस्तु।

सबसे बड़ा सदकर्म ईमान है
इसी प्रकार सबसे बड़ा सदकर्म ‘‘ईमान’’ है, जिसके बारे में दुनिया के समस्त धर्म वाले यह कहते हैं कि सब कुछ यहीं छोड़ जाना है, मरने के बाद आदमी के साथ केवल ईमान जाएगा। मनुष्य पर सबसे बड़ा हक़ उसके पैदा करने वाले का है। वह यह कि सबको पैदा करने वाला, जीवन और मृत्यु देने वाला स्वामी, पालनहार और उपासना के योग्य केवल अकेला अल्लाह है, तो फिर उसी की उपासना की जाए, उसी को स्वामी, लाभ हानि, सम्मान व अपमान देने वाला समझा जाए और उसके दिए हुए जीवन को उसकी इच्छा व आज्ञा अनुसार बसर किया जाए। उसी को माना जाए और उसी की मानी जाए। इसी का नाम ईमान है।
 ईमान केवल यह है कि मनुष्य अपने मालिक को अकेला माने, उस अकेले की उपासना और जीवन की हर घड़ी को मालिक की मर्ज़ी और उसके आदेशानुसार बसर करे। उसके दिए हुए जीवन को उसकी इच्छानुसार बसर करना ही दीन कहलाता है।

सच्चा दीन
सच्चा दीन आरंभ से ही एक है और उसकी शिक्षा है कि उस अकेले ही को माना जाए और उसी का हुक्म भी माना जाए। अल्लाह ने कुरआन में कहा है-
‘‘इस्लाम के अलावा जो भी किसी और दीन को अपनाएगा वह अस्वीकार्य होगा और ऐसा व्यक्ति परलोक में हानि उठाने वालों में होगा।’’ (अनुवाद कुरआन, आले इमरान 3:85)
मनुष्य की कमज़ोरी है कि उसकी नज़र एक विशेष सीमा तक देख सकती है। उसके कान एक सीमा तक सुन सकते हैं, उसके सूंघने चखने और छूने की शक्ति भी सीमित है। इन पाँच इन्द्रियों से उसकी बुद्धि को जानकारी मिलती है, इसी तरह बुद्धि की पहुँच की भी एक सीमा है।
वह मालिक किस तरह का जीवन पसंद करता है? उसकी उपासना किस तरह की जाए? मरने के बाद क्या होगा? जन्नत किन लोगों को मिलेगी? वे कौन से काम हैं जिनके नतीजे में मनुष्य नरक में जाएगा? इन सारी बातों का पता मानव बुद्धि, सूझ बूझ और ज्ञान से नहीं लगाया जा सकता।

पैग़म्बर (सन्देष्टा)
मनुष्यों की इस कमज़ोरी पर दया करके उसके पालनकार ने अपने बंदों में से उन महान मनुष्यों पर जिनको उसने इस दायित्व के योग्य समझा, अपने फ़रिश्तों द्वारा उन पर अपना संदेश उतारा, जिन्होंने मनुष्य को जीवन बसर करने और उपासना के तौर तरीके़ बताए और जीवन की वे सच्चाईयाँ बतायीं जो वह अपनी बुद्धि के आधार पर नहीं समझ सकता था।
ऐसे बुज़ुर्ग और महान मनुष्य को नबी, रसूल या सन्देष्टा कहा जाता है। इसे अवतार भी कह सकते हैं बशर्ते कि अवतार का मतलब हो ‘‘वह मनुष्य, जिसे अल्लाह ने मनुष्यों तक अपना संदेश पहुँचाने के लिए चुना हो’’। लेकिन आज कल अवतार का मतलब यह समझा जाता है कि ईश्वर मनुष्य के रूप में धरती पर उतरा है। यह व्यर्थ विचार और अंधी आस्था है। यह महा पाप है। इस असत्य धारणा ने मनुष्य को एक मालिक की उपासना से हटाकर उसे मूर्ति पूजा की दलदल में फंसा दिया।
वह महान मनुष्य जिनको अल्लाह ने लोगों को सच्चा रास्ता बताने के लिए चुना और जिनको नबी और रसूल कहा गया, हर क़ौम में आते रहे हैं। उन सब ने लोगों को एक अल्लाह को मानने, केवल उसी अकेले की उपासना करने और उसकी इच्छा से जीवन बसर करने का जो तरीक़ा (शरीअत या धार्मिक क़ानून) वे लाए, उसकी पाबन्दी करने को कहा। इनमें से किसी संदेष्टा ने भी ईश्वर के अलावा अपनी या किसी और की उपासना की दावत नहीं दी, बल्कि उन्होंने उसे सबसे भयानक और बड़ा भारी अपराध ठहराते हुए सबसे अधिक इसी पाप से लोगों को रोका। उनकी बातों पर लोगों ने विश्वास कर लिया और सच्चे मार्ग पर चलने लगे।

रसूलों की शिक्षा
एक के बाद एक नबी और रसूल आते रहे, उनके धर्म का आधार एक होता। वे एक ही धर्म की ओर बुलाते कि एक ईश्वर को मानो, किसी को उसके वजूद और उसके गुणों व अधिकारों में साझी न ठहराओ, उसकी उपासना व आज्ञा पालन में किसी को भागीदार न करो, उसके रसूलों को सच्चा जानो, उसके फ़रिश्ते जो उसके बन्दे और पवित्र प्राणी हैं, जो न खाते पीते हैं न सोते हैं, हर काम में मालिक की आज्ञा का पालन करते हैं। उसकी अवज्ञा नहीं कर सकते। वे अल्लाह की ख़ुदाई या उसके मामलों में कण बराबर भी कोई दख़ल नहीं रखतें हैं उनके अस्तित्व को मानो। उसने अपने फ़रिश्ते द्वारा अपने रसूलों व नबियों पर जो वहां (ईश वाणी) भेजी या किताबें भेजीं, उन सबको सच्चा जानो, मरने के बाद दोबारा जीवन पाकर अपने अच्छे बुरे कामों का बदला पाना है, इस विश्वास के साथ इसे सत्य जानो और यह भी मानो कि जो कुछ भाग्य में अच्छा या बुरा है, वह मालिक की ओर से है और रसूल उस समय अल्लाह की ओर जो शरीअत (विधान) और जीवन व्यापन का तरीक़ा लेकर आया है, उस पर चलो और जिन बुराईयों और वर्जित कामों और वस्तुओं से उसने मना किया है, उनको न करो।
जितने अल्लाह के दूत आए सब सच्चे थे और उन पर जो पवित्र ईश वाणी उतरी, वह भी सच्ची थी। उन सब पर हमारा ईमान है और हम उनमें भेद नहीं करते। सत्य तो यह है कि जिन्होंने एक ईश्वर को मानने की दावत दी हो, उनकी शिक्षाओं में एक मालिक को छोड़ कर दूसरों की पूजा ही नहीं स्वयं अपनी पूजा की भी बात न हो, उनके सच्चे होने में क्या संदेह हो सकता है? अलबत्ता जिन महा पुरुषों के यहां मूर्ति पूजा या बहुत से उपास्यों की उपासना की शिक्षा मिलती है, या तो उनकी शिक्षाओं में परिवर्तन कर दिया गया है या वे अल्लाह के दूत ही नहीं हैं। मुहम्मद (सल्ल.) से पहले के सारे रसूलों के जीवन के हालात में हेर फेर कर दिया गया है और उनकी शिक्षाओं के बड़े हिस्से को भी परिवर्तित कर दिया गया है।

अँधेरी दुनिया की किरण 
जब दुनिया घनघोर अंधेर में डूबी हुई थी ज़ुल्म, हत्या, चोरी चकारी, अपशगुन, मासूम बेटियों को जिंदा ज़मीन में गाड़ देना एवं इन जैसी अनेक और अनगिनत बुराइयाँ और महा पाप आम हो गया था, एवं एक अल्लाह के बजाए अनेक प्राणी एवं जीव जंतुओं की पूजा की जाने लगी थी उस वक़्त अल्लाह ने अपने रसूल (दूत) मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को दुनिया को इन बुराइयों से पाक करने और मनुष्यता को ज़ुल्म और पाप से निकालने के लिए एवंम मनुष्य को एक अल्लाह की पूजा के लिए बुलाने की खातिर अंतिम संदेष्ठा के रूप में भेजा ! जिन्होंने अपने दायित्व को पूर्ण रूप से पूरा किया और दुनिया को पाप और ज़ुल्म के अँधेरे से निकल कर पुण्य और न्याय के मार्ग पर चलने के लिए उनका पूर्ण रूप से मार्गदर्शन किया, फिर देखते ही देखते सम्पूर्ण विश्व इस किरन के उज्यारों से भर गया.
 मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने दुनिया को शांन्ति एवं सौहार्द की ऐसी शिक्षा दी कि उस से पूर्व किसी भी धर्म अथवा संस्कृति ने नहीं दी, और न हीं उसके बाद ही किसी ने ऐसी शिक्षा पेश की। 

अन्तिम दूत मुहम्मद (सल्ल.) 
यह एक बहुमूल्य सत्य है कि हर आने वाले रसूल और नबी की ज़बान से और उस पर अल्लाह की ओर से उतारे गए विशेष सहीफ़ों में एक अन्तिम दूत की भविष्यवाणी की गयी है और यह कहा गया है कि उनके आने के बाद और उनको पहचान लेने के बाद सारी पुरानी शरीअतें (विधान) और धार्मिक क़ानून छोड़ कर उनकी बात मानी जाए और उनके द्वारा लाए गए अन्तिम कलाम (कुरआन) और सम्पूर्ण दीन पर चला जाए। यह भी इस्लाम की सच्चाई का सबूत है कि पिछली किताबों में बहुत अधिक हेर फेर के बावजूद उस मालिक ने अन्तिम दूत मुहम्मद (सल्ल.) के आने की सूचना को परिवर्तित न होने दिया, ताकि कोई यह न कह सके कि हमें तो कुछ ख़बर ही न थी।
इन धार्मिक पुस्तकों में मुहम्म्द (सल्ल.) के जन्म स्थान, जन्म का युग और उनके गुणों व विशेषताओं आदि के बार में स्पष्ट इशारे दिए गए हैं।


मुहम्मद (सल्ल.) की पवित्र जीवनी का परिचय 
अब से लगभग साढ़े चैदह-सौ साल पहले वह अन्तिम नबी व रसूल मुहम्मद (सल्ल.) सउदी अरब के प्रसिद्व शहर मक्का में पैदा हुए। जन्म से कुछ महीने पूर्व ही आपके बाप अब्दुल्लाह का देहान्त हो गया था। माँ आमना भी कुछ अधिक समय तक जीवित नहीं रहीं। पहले दादा अब्दुल मुत्तलिब और उनके देहान्त के बाद चाचा अबू तालिब ने उन्हें पाला। आप अपने गुणों, भलाईयों व अच्छाइयों के कारण शीघ्र ही सारे मक्का शहर की आँखों का तारा बन गए। जैसे-जैसे आप बडे़ होते गए, आप से लोगों का प्रेम बढ़ता गया। आपको सच्चा और ईमानदार कहा जाने लगा। लोग सुरक्षा के लिए अपनी बहुमुल्य वस्तुएं आपके पास रखते, अपने आपसी विवादों व झगड़ों का फै़सला कराते। लोग मुहम्मद (सल्ल.) को हर अच्छे काम में आगे पाते। आप वतन में हों या सफ़र में, सब लोग आपके गुणों के गुन गाते।
उन दिनों वहाँ अल्लाह के घर काबा में 360 बुत, देवी देवताओं, बुजुर्गों व रसूलों की मूर्तियां रखी हुई थीं। पूरे अरब देश में बहुदेववाद (शिर्क) और कुफ़्र के अलावा हत्या, मारधाड़, लूटमार, गुलामों और औरतों के अधिकारों का हनन, उँच-नीच, धोखाधड़ी, शराब, जुआ, सूद, निराधार बातों पर युद्ध, ज़िना (व्यभिचार) जैसी न जाने कितनी बुराईयां फैली हुई थीं।
मुहम्मद (सल्ल.) जब 40 साल के हुए तो अल्लाह ने अपने फरिश्ते जिबरईल (अलैहि.) द्वारा आप पर कुरआन उतारना आरंभ किया और आपको रसूल बनाने की शुभ सूचना दी और लोगों को एक अल्लाह की उपासना व आज्ञा पालन की ओर बुलाने की ज़िम्मेदारी डाली।

मनुष्य की एक और कमजोरी
मनुष्य की यह कमज़ोरी रही है कि वह अपने बाप दादा और बुजुर्गों की गलत बातों को भी आँख बन्द करके मानता चला जाता है, चाहे बुद्धि और तर्क उन बातों का साथ नहीं दे रहे हों, लेकिन इसके बावजूद मनुष्य पारिवारिक बातों पर जमा रहता है और इसके विरुद्ध अमल तो क्या, कुछ सुनना भी पसन्द नहीं करता।

बाधाएँ और आज़माइशें
यही कारण था कि 40 साल की आयु तक मुहम्मद (सल्ल.) का सम्मान करने और सच्चा मानने और जानने के बावजूद मक्का के लोग अल्लाह के सन्देष्टा के रूप में अल्लाह की ओर से लायी गयी आपकी शिक्षाओं के दुश्मन हो गए। आप जितना अधिक लोगों को सबसे बड़ी सच्चाई शिर्क के विरूद्ध एकेश्वरवाद की ओर बुलाते, लोग उतना ही आप के साथ दुश्मनी करते। कुछ लोग इस सच्चाई को मानने वालों और आपका साथ देने वालों को सताते, मारते और दहकते हुए अंगारों पर लिटा देते। गले में फंदा डाल कर घसीटते, उनको पत्थरों और कोड़ों से मारते, लेकिन आप सबके लिए अल्लाह से दुआ मांगते, किसी से बदला नहीं लेते, सारी सारी रात अपने मालिक से उनके लिए सीधे मार्ग पर आने की दुआ करते। एक बार आप मक्का के लोगों से निराश होकर निकट के शहर ताइफ़ गए। वहाँ के लोगों ने उस महान मनुष्य का घोर अपमान किया। आपके पीछे शरारती लड़के लगा दिए जो आपको बुरा भला कहते।
उन्होंने आपको पत्थर मारे, इस हाल में आप शहर से बाहर निकल कर एक जगह बैठ गए। आपने उनको बददुआ नहीं दी बल्कि अपने मालिक से प्रार्थना की कि ‘‘ऐ मालिक! इनको समझ दे, ये जानते नहीं।’’
इस पवित्र ईशवाणी और वहां पहुँचाने के कारण आपका और आपका साथ देने वाले परिवार और क़बीले का तीन वर्ष तक पूर्ण सामाजिक बहिष्कार किया गया। इस पर भी बस न चला तो आपके क़त्ल की योजना बनायी गयी। अन्त में अल्लाह के आदेश से आपको अपना प्यारा शहर मक्का छोड़ कर दूसरे शहर मदीना जाना पड़ा। वहाँ भी मक्का वाले सेना तैयार करके बार-बार आप से युद्ध करने के लिए धावा बोलते रहे।

अन्तिम वसीयत
अपनी मृत्यु से कुछ ही महीने पहले आपने लगभग सवा लाख लोगों के साथ हज किया और तमाम लोगों को अपनी अन्तिम वसीयत की जिसमें आपने यह भी कहा - ‘‘लोगों! मरने के बाद क़यामत में हिसाब किताब के दिन मेरे बारे में भी तुम से पूछा जाएगा कि क्या मैंने अल्लाह का संदेश और उसका दीन तुम तक पहुँचाया था तो तुम क्या जवाब दोगे?’’ सबने कहा- ‘‘निःसंदेह आपने इसे पूर्ण रुप से हम तक पहुँचा दिया, उसका हक़ अदा कर दिया।’’ आपने आसमान की ओर उंगली उठायी और तीन बार कहा- ‘‘ऐ अल्लाह! आप गवाह रहिए, आप गवाह रहिए, आप गवाह रहिए।’’ इसके बाद आपने लोगों से फ़रमाया- ‘‘यह सच्चा दीन जिन तक पहुँच चुका है वे उनको पहुँचाएँ जिनके पास नहीं पहुँचा है।’’
आपने यह भी ख़बर दी कि मैं अन्तिम रसूल हूँ। अब मेरे बाद कोई रसूल या नबी नहीं आएगा। मैं ही वह अन्तिम संदेष्टा हूँ। जिसकी तुम प्रतीक्षा कर रहे थे और जिसके बारे में तुम सब कुछ जानते हो।
कुरआन में है-
‘‘जिन लोगों को हमने किताब दी है, वे इस (पैग़म्बर मुहम्मद) को ऐसे पहचानते हैं जैसे अपने बेटों को पहचानते हैं। यद्यपि उनमें का एक गिरोह सत्य को जानते बूझते छुपाता है।’’ (अनुवाद कुरआन, बक़रा 2:46)

हर मनुष्य का दायित्व
अब क़यामत तक आने वाले हर मनुष्य पर यह अनिवार्य है और उसका यह धार्मिक और मानवीय कर्तव्य है कि वह उस अकेले मालिक की उपासना करे, उसी का आज्ञा पालन करे, उसके साथ किसी को साझी न ठहराए, क़यामत और दोबारा उठाए जाने, हिसाब किताब, जन्नत व जहन्नम को सच माने और इस बात को माने कि परलोक़ में अल्लाह मालिक होगा। वहाँ भी उसका कोई साझी न होगा।

सारे ईश्वरीय धर्मों और ईश्वरीय किताबों में अपने समय में सत्य और सच्चाई की शिक्षा दी जाती थी लेकिन अब उन समस्त रसूलों और ईश्वरीय किताबों को सच्चा मानते हुए भी सबसे अन्तिम रसूल मुहम्मद (सल्ल.) पर ईमान लाना और उनकी लाई हुई अन्तिम पुस्तक व शरीअत पर चलना हर मनुष्य के लिए आवश्यक है।

  • जब बच्‍चा छोटा होता है उसे चित्रों वाली किताब पढ़ायी जाती है फिर थोड़ी आसान शब्‍दों की जब उसकी बुद्दि विकसित हो जाती है तब ऐसे किसी सहारे की जरूरत नहीं रहती.

  • जब जादू टोने में लोगों को विश्‍वास था तब मूसा को किताब दी और साथ में जादूई लाठी, फिर ईसा को मुर्दा को जिन्‍दा करने की शक्ति देकर किताब भेजी.

  • मानव जैसे जैसे मानव सभ्य और सुसंस्कार और बुद्धिमान होता गया वैसे वैसे वह उसको हिदायत करता रहा, कुरआन ने अपनी असल हिदायत को पिछली हिदायतों और किताबों ही का एक नया संस्करण कहा है। तीन किताबों को किताबे इलाही-आसमानी किताब अर्थात उसके (अल्लाह) द्वारा भेजी गयी मानता है।
ईसा ने पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बारे में फरमाया:
  • "तुम्हारे लिए भला है कि मैं चला जाऊँ, क्योंकि यदि मैं न जाऊँ तो सहायक (फारक़लीत) तुम्हारे पास नहीं आयेगा। किन्तु यदि मैं चला जाता हूँ तो मैं उसे तुम्हारे लिए भेज दूँगा। और जब वह आयेगा तो पाप के विषय में जगत के संदेह दूर करेगा।
  • मुझे अभी तुम से बहुत सी बातें करनी हैं किन्तु तुम अभी उन्हें सह नहीं सकते। किन्तु जब सत्य का आत्मा आयेगा तो वह तुम्हें पूर्ण सत्य की राह दिखायेगा; क्योंकि वह अपनी ओर से कुछ नहीं कहेगा। वह जो कुछ सुनेगा वही बतायेगा। और जो कुछ होने वाला है उसे प्रकट करेगा।"
    यूहन्ना की इंजील 16:7-8, 12-13
  • तौरात के अध्याय व्यवस्था विवरण 18 :18-19 में आया है कि "हे मूसा! मैं बनी इस्राईल के लिए उनके भाईयों ही में से तेरे समान एक नबी बनाऊँगा और अपने वचन (आदेश) को उसके मुँह में रख दूँगा। और वह उन से वही बात कहेगा जिसका मैं उसे आदेश दूँगा। जो आदमी उस नबी की बात नहीं मानेगा जो मेरे नाम पर बोलेगा तो मैं उस से और उसके क़बीले से इंतिक़ाम लूँगा।" ये शब्द आज तक उन की किताबों में मौजूद हैं, और उनके भाईयों में से कहा हैं जिसका मतलब है कि इस्माईल के बेटों में से। 
‘‘अल्लाह ने तुम्हारे लिए वही दीन (धर्म) मुक़र्रर फर्माया है, जिसकी उसने नूह को हिदायत दी थी और जिसकी (हे मुहम्मद!) हमने तुम पर वहय की है और जिसकी हमने इब्राहीम को, मूसा को और ईसा को वसीयत की थी, यह कि इस दीन को क़ायम करों और इसके भीतर विभेद न पैदा करो‘‘ - शूराः15

सच्चा दीन केवल एक हैं। वह आरंभ ही से एक है। इसलिए उस एक को मानना और उसी एक की मानना इस्लाम है। दीन कभी नहीं बदलता, केवल शरीअतें समय के अनुसार बदलती रहीं हैं और वह भी उसी मालिक के बताए हुए तरीके़ पर। जब मनुष्य की नस्ल एक है और उनका मालिक एक है तो रास्ता भी केवल एक है। कुरआन कहता है-
‘‘दीन तो अल्लाह के निकट केवल इस्लाम ही है।’’ (अनुवाद कुरआन, आले इमरान 3:19)

एक और सवाल
कुरआन अल्लाह की वाणी है, उसने दुनिया को अपने सच्चे होने के लिए जो तर्क दिए हैं वे सबको मानने पड़े हैं और आज तक उनकी काट नहीं हो सकी। उसने मुहम्मद (सल्ल.) के अन्तिम नबी होने की घोषणा की है।
मुहम्मद (सल्ल.) के पवित्र जीवन का एक एक पल दुनिया के सामने है। उनका सम्पूर्ण जीवन इतिहास की खुली किताब है। दुनिया में किसी भी मनुष्य का जीवन आपके जीवन की भांति सुरक्षित और इतिहास की रोशनी में नहीं है। आपके दुश्मनों और इस्लाम दुश्मन इतिहासकारों ने भी कभी यह नहीं कहा कि मुहम्मद (सल्ल.) ने अपने व्यक्तिगत जीवन में कभी किसी बारे में झूठ बोला हो। आपके शहर वाले आपकी सच्चाई की गवाही देते थे। जिस आदर्श मनुष्य ने अपने व्यक्तिगत जीवन में कभी झूठ नहीं बोला।
सारी धार्मिक पुस्तकों में अन्तिम ऋषि कलकी अवतार की जो भविष्य वाणियां की गयीं और निशानियाँ। बतायी गयी हैं, वे केवल मुहम्मद (सल्ल.) पर पूरी उतरती हैं।
पंडित वेद प्रकाश उपाध्याय का निर्णय:
हिन्दुओं के धार्मिक ग्रन्थ वेदों में अंतिम अवतार और नराशंस के इस धरती पर आ जाने के बाद उनको और उनके दीन को मानने पर बल दिया गया है।


 ईमान की ज़रूरत
मरने के बाद के जीवन के अलावा इस संसार में भी ईमान हमारी ज़रूरत है और मनुष्य का कर्तव्य है कि एक स्वामी की उपासना और आज्ञापालन करे।
वह कैसा मनुष्य है, जो अपने सच्चे मालिक को भूल कर दर दर झुकता फिरे।
  • अगर ये सच्ची बातें आपके दिल में घर कर गयी। तो आइए! सच्चे दिल और सच्ची आत्मा वाले मेरे प्रिय मित्र उस मालिक को गवाह बनाकर और ऐसे सच्चे दिल से जिसे दिलों का हाल जानने वाला मान ले, इक़रार करें और प्रण करें:
‘‘अशहदु अल्लाइलाह इल्लल्लाहु व अशहदु अन्न मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू’’
‘‘मैं गवाही देता हूँ इस बात की कि अल्लाह के सिवा कोई उपासना योग्य नहीं (वह अकेला है उसका कोई साझी नहीं) और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद अल्लाह के बन्दे और उसके रसूल (दूत) हैं’’।
दयावान और करीम मालिक मुझे और आपको इस रास्ते पर मरते दम तक जमाए रखे। आमीन!

आपका कर्तव्य
ईमान और इस्लाम की यह सच्चाई हर उस भाई का हक़ और अमानत है, जिस तक यह हक़ नहीं पहुँचा है, इसलिए आपका भी कर्तव्य है कि निःस्वार्थ होकर अल्लाह के लिए केवल अपने भाई की हमदर्दी में उसे मालिक के प्रकोप से बचाने के लिए दुख दर्द के पूरे अहसास के साथ जिस तरह अल्लाह के रसूल मुहम्मद (सल्ल.) ने उम्र भर यह सच्चाई पहुँचाई थी, आप भी पहुँचाएँ। उसको सही सच्चा रास्ता समझ में आ जाए। उसके लिए अपने मालिक से दुआ करें। कही बात दिल पर प्रभाव डालती है, इसलिए कि अल्लाह उस व्यक्ति से बहुत अधिक प्रसन्न होता है, जो किसी को कुफ़्र और शिर्क से निकाल कर सच्चाई के मार्ग पर लगा दे।

ईमान लाने के बाद
अब आपका सिर अल्लाह के अलावा किसी के आगे न झुके। सच्चे दिल से यह दुआ करनी है कि ऐ हमारे मालिक! हमको, परिवार के लोगों और रिश्तेदारों को, हमारे दोस्तों को और इस धरती पर बसने वाली तमाम मानवता को ईमान के साथ ज़िन्दा रख और ईमान के साथ इन्हें मौत दे। इसलिए कि ईमान ही मानव समाज का पहला और आखि़री सहारा है, जिस तरह अल्लाह के एक पैग़म्बर इब्राहीम (अलैहि.) जलती हुई आग में अपने ईमान की वजह से कूद गए थे और उनका एक बाल तक न जल सका था, आज भी उस ईमान की ताक़त आग को गुल व गुलज़ार बना सकती है और सच्चे रास्ते की हर रुकावट को ख़त्म कर सकती है।

26 September, 2011

पैग़म्बरे इस्लाम (स0) के व्यक्तित्व के बारे में विश्व स्तरीय बुद्धिजीवी क्या कहते हैं?

इस्लाम अकेला ऐसा धर्म है जिस में यह विशेषता पाई जाती है कि वह विभिन्न परिवर्तनों को अपने मे समो सके और ख़ुद को ज़माने के साथ ढाल सके। मैं ने हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा के धर्म के बारे में ये भविष्यवाणी की है कि उनका धर्म भविष्य में यूरोप मे स्वीकार किया जाएगा। जैसा कि आज के दौर मे इसके स्वीकार करने की शुरूआत हो चुकी है।

इस्लाम की पैदाइश पैग़म्बरे इस्लाम (स0) के परिश्रम के नतीजे में मानवता के इतिहास में मील के पत्थर की हैसियत रखती है। जिस मे बेशुमार सर्व व्यापी उन्नति एवं प्रगति ने इन्सान को अपने साए में ले लिया है।
इस आसमानी धर्म का कम से कम फ़ायदा ये हुआ कि लिखने पढ़ने और इस्लामी दुनिया में विद्या के सर्व व्यापी होने को बढ़ावा मिला और इस के साथ ही ये स्पेन, जर्मनी, इंग्लैड जैसे देशों और यूरोपी हुकूमतों की तरफ़ हस्तांतरित हुआ और उसके बाद पुरी दुनिया मे चमका। इस तरह से इस आसमानी मील के पत्थर के बाद रोम, मिस्र एवं ईरान जैसी संस्कृति एवं सभ्यता के पास भी उसका कोई जवाब न था। इस वास्तविकता के इतिहासिक तथ्यों से इन्कार नही किया जा सकता और ये बे शुमार हैं। उनमें से एक तर्क उन इस्लामी उलेमा एवं विद्यावान बल्कि ग़ैर मुस्लिम और पश्चिमी विद्यावानों का बार-बार स्वीकार करना है जिस के एक नमूने का हम संक्षेप में वर्णन करेगें:
पश्चिमी समाज के एक प्रसिद्ध विद्यावान एवं स्कालर अनादर, अपमान एवं तिरस्कार के बावजूद पैग़म्बर इस्लाम (स0) को न सिर्फ़ यह कि प्रथम श्रेणी के धर्म गुरु के तौर पर स्वीकार करते हैं बल्कि पूरी सच्चाई और सत्यता के साथ इस्लाम को उसकी बेशुमार विशेषताओं के साथ एक विश्वव्यापी धर्म स्वीकार करते हैं और शायद यही वजह है कि इस सच्चाई ने अपमान और तिरस्कार करने वालों के दर्द को बढ़ा दिया है और इस सच्चाई के जवाब में उन्हे बे दीनी कट्टरपन और असभ्यता के आलावा कोई और रास्ता दिखाई नही देता।

टाल्सटवाय:

प्रसिद्ध रूसी लेखक मुरब्बी एवं फ़ल्सफ़ए अख़लाक़ के माहिर जिस की शिक्षा और आइडियालाँजी को बड़े-बड़े राजनीतिज्ञो ने आइडियल बनाया है, वह कहते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम (स0) का महान व्यक्तित्व और हस्ती सम्पूर्ण सम्मान एवं सत्कार के योग्य है और उन का धर्म बुद्धी एवं विवेक के अनुकूल होने की वजह से एक दिन विश्व व्यापी हो जाएगा।

कार्ल मार्क्स :
उन्नीसवी शताब्दी का यह जर्मन जाती फ़लसफ़ी (दर्शन शास्त्रीय), राजनितिज्ञ एवं क्रान्तिकारी नेता पैग़म्बरे इस्लाम (स) के व्यक्तित्व का गहराई से बोध करने के बाद अपने विचार इस तरह व्यक्त करता है:

मोहम्मद (स0) ऐसे इंसान थे जो बुत पूजने वालों के बीच दृढ़ संकल्प के साथ खड़े हुए और उन्हे एकेश्वर वाद एवं तौहीद की दावत दी और उनके दिलों में बाक़ी रहने वाली रूह और आत्मा का बीज बो दिया। इसलिए उन्हे (स0) न सिर्फ़ ये कि उच्च श्रेणी के लोगों के दल में शामिल किया जाए बल्कि वह इस बात के पात्र हैं कि उनके ईश्वरीय दूत होने को स्वीकार किया जाए और दिल की गहराइयों से कहा जाए कि वह अल्लाह के दूत (रसूल) है।

वेलटर फ़्रान्सवी:

यक़ीनन हज़रत मोहम्मद (स0) उच्च श्रेणी के इंसान थे, वह एक कुशल शासक, अक़्ममंद तथा कुशल विधायक, एक इन्साफ़ पसंद शासक और सदाचारी पैग़म्बर थे, उन्होंने (स0) जनता के सामने अपने चरित्र तथा आचरण का जो प्रदर्शन किया वह इस से ज़्यादा संभव नही था।

पीर सीमून लाप्लास्क:

ये अठ्ठारवीं शताब्दी के सुप्रसिद्ध अभ्यस्त ज्योतिषी और गणितिज्ञ थे, उन के विचारों ने ज्योतिष विद्या एवं गणित मे क्रान्ति ला दी, वह उन पश्चिमी रिसर्च करताओं में से हैं जिन्होंने इस्लाम धर्म के बारे मे इस तरह से अपने विचार व्यक्त किये हैं:

हज़रत मोहम्मद (स0) का दीन और उनके उपदेश, इंसान के समाजिक जीवन के दो नमूने हैं। इसलिए मैं इस बात को स्वीकार करता हूँ कि इस दीन का प्रकट होना और इसके अक़्ल मंदी भरे उपदेश बड़े और महत्वपूर्ण हैं।

प्रोफ़ेसर आरनिस्ट हैकल:

उन्नीसवी शताब्दी के सब से बड़े और प्रसिद्ध जर्मन जाति के फ़लसफ़ी का कहना है:

इस्लाम धर्म बहुत आधुनिक होने के साथ साथ बिना किसी मिलावट और उच्च श्रेणी की तौहीदी का रखने वाला है।

ये अंग्रेज़ लेखक एवं रिसर्च करता अपनी किताब सरमायए सुख़न में इस तरह लिखता है:

इस्लाम अकेला ऍसा धर्म है जिस पर दुनिया के सारे शरीफ़ लोग गर्व कर सकते हैं, वह अकेला ऐसा दीन है जिसे मैंने समझा है और मैं बार बार इस बात को कहता हूँ कि वह दीन जो सृष्टि एवं उत्पत्ति के रहस्यों एवं भेदों को जानता है और तमाम चरणों में सभ्यता एवं संस्क्रति के साथ है, वह इस्लाम है।

गोएटे:

ये जर्मनी का सुप्रसिद्ध दानिशमंद, शायर और लेखक है जिस ने जर्मन एवं विश्व साहित्य पर गहरा असर छोड़ा है, वह अपनी किताब दीवाने शरक़ी व ग़रबी में लिखता है:

क़ुरआने करीम नामी किताब की प्रविष्टियां हमें आकर्षित करती हैं। और आश्चर्य में डालती हैं और इस बात पर मजबूर करती हैं कि हम उसका आदर व सत्कार करें।

जार्ज बरनार्ड शाह (1856 से 1950)

ये शैक्सपियर के बाद इंग्लैंड का सब से बड़ा लेखक है जिस के विचारों ने धर्म, ज्ञान, अर्थ जगत, परिवार और बनर एवं कला मे श्रोताओं पर गहरी छाप छोड़ी है। जिस के विचारों ने पश्चिमी जनता के अन्दर उज्जवल सोच की भावना पैदा कर दी। वह पैग़म्बरे इस्लाम के बारे में लिखता है:

मैं सदैव मोहम्मद (स0) के धर्म के बारे में, उसके जीवित रहने की विशेषता की वजह से आश्चर्य में पड़ जाता हूँ और उसका सम्मान करने पर ख़ुद को मजबूर पाता हूँ, मेरी निगाह मे इस्लाम ही अकेला ऍसा धर्म है जिस मे ऐसी विशेषता पाई जाती है कि वह किसी भी परिवर्तन एवं बदलाव को स्वीकार कर सकता है और ख़ुद को ज़माने की आवश्यकताओं में ढालने की क्षमता रखता है। मैं ने मोहम्मद (स0) के दीन के बारे में ये भविष्यवाणी की है कि भविश्व मे यूरोप वालों को स्वीकार्य होगा जैसा कि आज इस बात की शुरूआत हो चुकी है। मेरा मानना है कि अगर इस्लाम के पैग़म्बर जैसा कोई शासक सारे ब्रह्माण्ड शासन करे तो इस दुनिया की मुश्किलात एवं समस्याओं का निपटारा करने में कामयाब हो जाएगा कि इंसान संधि एवं सौभाग्य तक पहुंच जाएगा जिस की उसे गंभीर आवश्यकता है।

एडवर्ड गेबिन:

ये अठ्ठारहवी शताब्दी का इंग्लैंड (England) का सब से बड़ा लेखक है जिस ने रोम के साम्राज्य की बरबादी का प्रसिद्ध इतिहास लिखा है। वह क़ुरआन मजीद के बारे में लिखता हैं:

अटलस महासागर से लेकर हिन्दुस्तान मे मौजूद गंगा नदी के तट तक क़ुरआन मजीद न सिर्फ़ फ़िक़्ही क़ानून के तौर पर स्वीकार किया जाता है बल्कि वह देशों के बुनियादी क़ानून (संविधान) जिस में फ़ैसले एवं अदालत, नागरिक्ता प्रणाली, सज़ा के क़ानून से लेकर वित्तीय मामलों तक सब कुछ पाया जाता है। और ये सब की सब चीज़ें एक स्थिर क़ानून के तहत अंजाम पाती हैं और ये सब ख़ुदाई हुकूमत की जलवा गरी है। दूसरे शब्दों में क़ुरआन मजीद मुसलमानो के लिए एक सामान्य नियम और संविधान की हैसियत रखता है जिस में धर्म, समाज, नागरिकता प्रणाली, सेना, अदालत, जुर्म, और सज़ा के तमाम क़ानून और इसी तरह से इंसान की दैनिक एकाकी एवं समाजी जीवन से लेकर धार्मिक कार्यों तक जिस में तज़किय ए नफ़्स (आत्मा को बुराईयो एवं गुनाहो से पाक करना) से लेकर स्वास्थ के सिद्धांत एकाकी अधिकारों से समाजिक अधिकारों तक और नैतिकता से लेकर अपराध तक, इस दुनिया के कष्ट एवं कर्म दंडो से लेकर उस दुनिया की यातनाएं एवं कर्म दंड सब को शामिल है

प्रोफ़ेसर वेल ड्रान (1885 से 1981)

ये अमरीका का प्रसिद्ध लेखक एवं साहित्यकार है जिस की किताबों का वर्तमान मे लाखों लोग अध्ययन करते हैं। वह पैग़म्बरे इस्लाम (स0) के व्यक्तित्व के बारे में इस तरह से अपने विचार व्यक्त करता है:

अगर इस सम्मानित व्यक्ति का आम जनता पर होने वाले असर की गणना करें तो यक़ीनन हम को कहना पड़ता है कि हज़रत मोहम्मद (स0) मानव इतिहास के सबसे ज़्यादा सम्मानित व्यक्तियों में से हैं। वह चाहते थे कि इस क़ौम के शैक्षिक एवं नैतिक स्तर को, जो गर्मी की त्रीवता और रेगिस्तान के सूखे की वजह से ख़ौफ़ एवं डर के अंधेरे में डूबे हुए थे, उठाएं और उन्हें इस सिलसिले में जो तौफ़ीक़ मिली वह वह विश्व के गुज़िश्ता तमाम सुधारकों से ज़्यादा थी। मुश्किल से ही किसी को उन के दल में खड़ा किया जा सकता है जिस ने अपनी सारी इच्छाएं धर्म को समर्पित कर दीं, इसलिए कि वह इस धर्म को सच्चा मानते थे। मोहम्मद (स0) ने बुतों की पूजा करने वालो और रेगिस्तान में तितर बितर क़बीलों को एक उम्मत में बदल दिया और दीने यहूद एवं दीने मसीह और अरब के प्राचीन धर्म से बड़ा और ऊँचा एक आसान दीन और उज्जवल एवं मज़बूत धर्म की नीव रखी, जिसकी मानवीयत का आधार राष्ट्रीय बहादुरी थी, जिस ने एक ही पीढ़ी के अंदर सौ से ज़्यादा जंगों मे जीत हासिल की और एक शताब्दी के अंदर एक महान एवं विभय हुकूमत स्थापित कर ली और वर्तमान मे उस के पास एक स्थायी ताक़त है जिस ने आधी दुनिया को वश मे किया हुआ है।

16 September, 2011

हिन्दल वली यानी ख्वाज़ा-ए-ख्वाज़गां हज़रत ख्वाज़ा मुईनुद्दीन चिश्ती र0 अ0

  • वलादत बा सआदत:
ख्वाज़ा-ए-ख्वाज़गां हज़रत ख्वाज़ा मुईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्लाहि अलैहि ५३७ हिजरी में खुरासान प्रांत के सन्जर नामक गाँव में पैदा हुए ! सन्जर कन्धार से उत्तर की जानिब है ! और आज भी वह गाँव मौजूद है ! कई लोग इसको सजिस्तान भी कहते है ! ख्वाज़ा बुज़ुर्ग के वालिद माजिद का नाम गियासुद्दीन हसन है, वह आठवीं पुश्त में हज़रत मूसा काज़िम के पोते होते हैं,वालिदा माजिदा का नाम बीबी उम्मुलवरा उर्फ़ बीबी माहे नूर है जो चन्द वास्तों से हज़रत इमाम हसन की पोती होती हैं ! इसलिए आप बाप की तरफ़ से हुसैनी और माँ की तरफ़ से हसनी सैयद है!
आप की वालिदा माजिदा हज़रत बीबी उम्मुलवरा से रिवायत है कि जिस वक़्त से मेरा नूरे नज़र मुईनुद्दीन मेरे शिकम में आया, मेरा घर ख़ैर व बरक़त से मामूर नज़र आने लगा ! कई बार मुझे ख़ूबसूरत ख़्वाब नज़र आते थे ! जिस वक़्त अल्लाह तआला ने आपके जिस्म में जान डाली इस वक़्त से यह मालूम हो गया था कि आधी रात से लेकर सुबह तक मेरे शिकम से तस्बीह व तःलील की आवाज़ आती थी ! मैं उस मुबारक आवाज़ में सरशार हो जाती थी ! जब आप पैदा हुए तो मेरा घर नूर से जगमगा उठा!

  • तालीम व तर्बियत:
इब्दताई तालीम घर पर हुई ! आपके वालिद बुजुर्गवार एक बड़े आलिम थे ! ख्वाज़ा साहब ने नौ साल की उम्र में कुरआन मजीद हिफ्ज़ कर लिया और इसके बाद सन्जर के मक्तब में दाख़िला हुआ ! आपने यहाँ इब्तदाई तौर से तफ्सीर, फ़िक्ह और हदीस की तालीम पाई और थोड़े समय में आपने काफी इल्म हासिल कर लिया!

  • वालिद बुजुर्गवार का विसाल:
ख्वाज़ा साहब र० अ० की उम्र अभी चौदह साल की थी कि माँ बाप का साया सर से उठ गया और आप यतीम हो गये ! वालिद माजिद की मृत्यु के कुछ महीने बाद वालिदा माजिदा भी इस दुनिया से चली गई ! इस सख्त सदमे का उन पर बहुत असर हुआ ! और हमारे ख्वाजा बे-यार व मददगार रह गये ! उस बक्त आपकी उम्र सिर्फ पन्द्रह साल की थी ! इतनी उम्र में माँ-बाप का साया सर से उठना कोई मामूली बात नहीं ! आपने सब्र किया मगर दुनिया से दिल उचट गया ! आपने फ़ैसला किया, "यह दुनिया कुछ भी नहीं है !" हक़ीकी और असल राहत इंसान को उसी वक़्त मिल सकती है जबकि वह अपने खुदा को पहचान ले ! इस तरह आप रूहानियत की दुनिया में पहुँच गये, दिल में एक जोशे हैरत पैदा हो गया, आपने हर मुमकिन सब्र और तहम्मुल से काम लिया मगर फिर भी दिल क़ाबू में न रहा ! इश्क की आग भड़क उठी और जब दीवानगी हद से बढ़ने लगी तो आपकी नज़रों में दुनिया और इसकी दौलत हक़ीर नज़र आने लगी ! आपने घर का सामान चुनांचे बाग़ और पवन चक्की को बेचकर, और जो कुछ नगद व सामान पास मौजूद था, राहे खुदा में फकीरों और बेसहारों में बाँट दिया और थोडा सा जरूरी सामान साथ लेकर तलाशे हक़ में निकल पड़े!

  • ख्वाज़ा  र० अ० बीस साल तक पीर की ख़िदमत में:
हज़रत ख्वाज़ा मुईनुद्दीन चिश्ती एक मुद्दत से ही हज़रत ख्वाज़ा उस्मान हारुनी र० अ० से अक़ीदत रखते थे ! अब इस क़दर शेदाई हो गये कि हर वक़्त सफ़र हो या क़ियाम हो अपने गुरु की ख़िदमत में हाज़िर रहते ! उनका बिस्तर, तकिया, पानी, का मशकीज़ा और दूसरा जरूरी सामान अपने सर और कन्धों पर रख कर हमसफ़र होते थे! हज़रत ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० बीस साल तक अपने पीर की ख़िदमत में रहकर अल्लाह तआला की इबादत करते रहे ! और इसी अर्से में मार्फ़त व हक़ीक़त की सभी मंजीलें तय कर ली ! आपने पीर व मुर्शिद से जो नसीहत भरी बाते सुनी और हैरतअंगेज़ करामात देखे उनमें से कुछ का ब्यान खुद ख्वाज़ा बुज़ुर्ग के शब्दों में पेश किया जाता है:
एक बार में अपने पीर हज़रत ख्वाज़ा उस्मान हारुनी र० अ० के साथ सिवस्तान के सफ़र में था कि एक दिन हम एक खान्क़ाह में पहुंचे ! वहां एक बुज़ुर्ग रहते थे ! उन बुज़ुर्ग का नाम सदरुद्दीन अहमद सिवस्तानी था ! ये बड़े ही पहुंचे हुए बुज़ुर्ग थे ! मैं कई दिन तक उनकी ख़िदमत में रहा ! जो शख्स उनकी ख़िदमत हाज़िर होता खाली हाथ वापस नहीं जाता ! आप अन्दर से कोई चीज़ लाकर देते और फरमाते कि मेरे हक़ में दुआ करो कि मैं ईमान सलामत लेकर जाऊं!

एक दिन हज़रत ख्वाज़ा उस्मान हारूनी र० अ० की तरफ़ मुखातब होकर फ़रमाया:
'कल क़ियामत के दिन, जितने अम्बिया, औलिया, और मुसलमान है, जो कोई नमाज़ की जिम्मेदारियों से सलामती के साथ निकल गया, वह बच गया और जिसने नमाज़ की पाबंदी नहीं की उसे दोज़ख में रहना होगा !
एक बार मैं अपने मुर्शिद हज़रत ख्वाज़ा उस्मान हारुनी र० अ० के साथ रास्ते में ख्वाज़ा बहाउद्दीन र० अ० से मुलाक़ात हो गई ! उनका दस्तूर था कि जो शख्स उनकी ख़िदमत हाज़िर होता, खाली हाथ वापस नहीं जाता ! अगर कोई शख्स जिसके पास पहनने के लिये कपड़े नहीं होते तो आप अपने कपड़े उतार, देना चाहते, उसी वक़्त फ़रिश्ते अच्छा लिबास हाज़िर कर देते ! हम कुछ दिन उनकी महफ़िल में रहे ! जब हम चलने लगे तो आपने नसीहत फ़रमाई:
'जो कुछ तुझे मिले उसे अपने पास न रखना बल्कि खुदा की राह में दे देना, ताकि खुदा के दोस्तों में तुम्हारा शुमार हो!'
एक बार दुरवेशों की महफ़िल में अपने पीर व मुर्शिद हज़रत ख्वाज़ा उस्मान हारुनी र० अ० की ख़िदमत में हाजिर था इतने में एक बूढ़ा शख्स आपकी ख़िदमत में आया ! उसने आपको सलाम किया, पीर व मुर्शिद ने खड़े होकर सलाम का जवाब दिया और बड़े अदब से बिठाया ! उसने अर्ज़ किया: 'मेरा लड़का तीस साल हुए मुझसे जुदा है !' पता नहीं जिंदा है या नहीं ! मैं उसकी जुदाई से निढाल हो गया हूँ ! आप मेरी मदद फ़रमाये, हज़रत ने जब ये बात सुनी तो, मुराकाबे में सर झुका दिया, थोड़ी देर बाद सर उठाकर हाज़रीन से फ़रमाया:
'इस पीर मर्द के लड़के की सलामती के लिये फ़ातिहा इख्लास पढ़ो!'
फ़ातिहा इख्लास पढ़ी गई ! इसके बाद आपने उस बूढ़े से फ़रमाया: 'आप जाये और जिस वक़्त आपका लड़का मिल जाये उसको साथ लेकर मेरी मुलाक़ात को आए!
अभी वह बूढ़ा शख्स रास्ते में ही था कि एक शख्स ने आकर ख़बर दी कि आपका लड़का मिल गया ! घर पहुँचकर लड़के को सीने से लगाया और फिर लड़के को लेकर हुज़ूर की ख़िदमत में हाज़िर हुआ ! ख्वाज़ा उस्मान हारुनी र० अ० ने उस लड़के से मालूम किया कि तुम कहाँ थे ? उसने अर्ज़ किया: 'समुन्द्र में एक नाव पर था और नाव के मालिक ने मुझे जंजीरों से बांद रखा था ! आज एक दुरवेश आपके हमशक्ल बल्कि आप ही थे, तशरीफ़ लाये और जंजीरों को तोड़कर और अपने आगे खड़ा करके हुक्म दिया कि अपने पांव मेरे हाथ पर रखो और आँखे बंद करों !' थोड़ी देर बाद फ़रमाया: 'आँखे खोलों!' जिस वक़्त मैंने आँखें खोली तो अपने आपको मकान के दरवाज़े पर खडा पाया ! इतना कहकर वह कुछ और कहना चाहता था मगर हज़रत ने इशारे से चुप रहने को कहा ! बूढ़े ने यह सुनकर हज़रत के दामन पर सिर रख दिया और फिर बाप बेटे चले गये!
हज़रत ख्वाज़ा मुईनुद्दीन चिश्ती र० अ० पूरे बीस साल तक अपने पीर व मुर्शिद हज़रत ख्वाज़ा उस्मान हारूनी र० अ० की ख़िदमत में हाज़िर रहे ! जान व दिल से पीर के हर हुक्म का पालन करते रहे ! आपकी इस जान-तोड़ ख़िदमत के बदले हज़रत शेख़ ख्वाज़ा उस्मान हारूनी र० अ० ने ऐसी नेमत और और दौलत अता फ़रमाई जो हद व हिसाब से बाहर है!
मारफ़त व हकीक़त की तमाम मंजिलें तय कराने के बाद पीरे कामिल हज़रत शेख़ ख्वाज़ा उस्मान हारूनी र० अ० ने वह तमाम तबर्रुकात जो उन्होंने बुज़ुर्गाने अज़ीम से हासिल की थी अपने होनहार मुरीद हज़रत ख्वाज़ा मुईनुद्दीन चिश्ती को अता फ़रमाकर नसीहत फ़रमाई: 'ऐ मुईनुद्दीन ! अल्लाह की मख्लूक से किसी चीज़ का लालच न करना ! कभी भी आबादी में न ठहरना, और किसी से कुछ न माँगना !'
ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० फरमाते है कि पीर व मुर्शिद ने फातिहा पढ़कर मेरे सर और आँखों को चूमा और फ़रमाया: 'तुझे ख़ुदा के सुपुर्द किया ! मुईनुद्दीन हक़ का महबूब है और इसकी मुरीदी पर बड़ा नाज़ है!'

  • सफ़र और बुज़ुर्गों से मुलाक़ाते:
हज़रत ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० ने पीर व मुर्शिद शेख़ ख्वाज़ा उस्मान हारूनी र० अ० से इजाज़त हासिल करके बगदाद का रुख किया ! रास्ते मैं कई जगह ठहरते हुए खिरकान पहुंचे ! खिरकान उस जमाने मैं एक छोटा सा क़स्बा था मगर उसकी शोहरत शेख़ अबुल हसन खीरकानी र० अ० की वजह से थी !रास्ते में जहां कोई ख़ुदा रसीदा बुज़ुर्ग का मज़ार मिला आपने क़ियाम फ़रमाया और बातनी फैज़ हासिल किया !
माजिंदान की सरहद के क़रीब इस्तराबाद एक मशहूर और अच्छा शहर था ! जिस वक़्त आप वहां पहुंचे, शेख़ नासिरुद्दीन र० अ० वहां क़ियाम पंजीर थे ! वह एक बुलन्द मर्तबा और ख़ुदा रसीदा बुज़ुर्ग थे ! उनका सिलसिला सिर्फ़ दो वास्तों से हज़रत शेख़ बायज़ीद से बुस्तामी र० अ० से मिलता था हज़रत ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० काफी दिन तक उनकी ख़िदमत में रहकर नूरे इर्फ़ान हासिल करते रहे ! वहां से रवाना होकर इस्फाहान चले गये ! उस वक़्त इस्फाहान दुनिया के ख़ूबसूरत और मशहूर शहरों में गिना जाता था ! उन्ही दिनों इस्फाहान में शेख़ महमूद इस्फ़ाहानी तशरीफ़ फरमाऐ थे ! हमारे ख्वाज़ा ने आपसे मुलाक़ात की ! यह मुलाक़ात भी अजीब व ग़रीब थी!
दो मरदाने हक़ आमने-सामने खड़े थे और हर दो जानिब से नूर की बारिश हो रही थी!
क़ुदरत का करिश्मा तो देखिये कि उसी ज़माने में हज़रत ख्वाज़ा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी र० अ० मुर्शिद कामील की तलाश में सफ़र करते हुए इधर आ निकले और इस्फाहान में कियाम किया आप अक्सर शेख़ महमूद इस्फ़ाहानी र० अ० की ख़िदमत में हाज़िर होते रहते थे, क्योकि आप उनसे बहुत अक़ीदत रखते थे, इसलिए आप से बैअत करना चाहते थे मगर क़ुदरत को कुछ और ही मंजूर था !  एक दिन आपकी नज़र हज़रत ख्वाज़ा मुईनुद्दीन चिश्ती र० अ० पर पड़ गयी जिससे नूरानी किरणें निकल रहीं थी बस फिर क्या था, आप हज़रत ख्वाज़ा मुईनुद्दीन चिश्ती र० अ० की ख़िदमत में हाज़िर होने के लिये बेक़रार हो गये और एक दिन हुज़ूर ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० की ख़िदमत में हाज़िर हो ही गये, हज़रत ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० इस्फाहान से कूच फ़रमाकर हमदान पहुंचे ! वहां उस वक़्त के सबसे बड़े और ज़बरदस्त आलिम हज़रत शेख़ यूसुफ़ हमदानी से मुलाक़ात करके फ़ैज़ र० अ० से मुलाक़ात करके बरकत व फ़ैज़ हासिल किया!
हमदान से रवाना होकर आप तबरेज़ पहुंचे ! उन दिनों तबरेज़ में हज़रत शेख़ अबू सईद तबरेज़ी र० अ० की बहुत शोहरत थी ! कुछ दिन वहां रहकर उनकी पाक सोहबत से दिली सुकून हासिल करते रहे ! बाद में आप बग़दाद तशरीफ़ ले गये!

  • ख्वाज़ा साहब र० अ० बग़दाद में:
हमदान से रवाना होकर हज़रत ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० ने बग़दाद में क़ियाम फ़रमाया ! बग़दाद उस ज़माने में इल्म व फ़न का मरकज़ था ! बड़े-बड़े प्रभावशाली और बुलन्द मर्तबा आलिम, फ़ाज़िल सूफ़ी और औलिया वहां मौजूद थे ! उनकी मल्जिसें आलिमों और फाज़िलों से भरी रहती थी ! ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० भी उनकी एक-एक महफ़िल में पहुंचते और फ़ैज़ हासिल करते रहे ! बग़दाद पहुंचकर हुज़ूर ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० को मालुम हुआ कि उस ज़माने के बेमिस्ल आलिम शेख़ अबू नजीब सहरवरदी र० अ० और जनाब पीराने पीर दस्तगीर सैयद अब्दुल क़ादर जीलानी र० अ० इंतिक़ाल फ़रमा चुके थे ! ख्वाज़ा साहब र० अ० इन बुजुर्गों के मज़ार पर हाज़िर हुए और एतकाफ़ फ़रमाया ! इनके अलावा आपने दूसरे बुजुर्गों के पुर नूर मजारों पर भी हाज़िरी दी और फैज़े बातनी हासिल किया!

  • ख्वाज़ा साहब र० अ० अल्लाह के दरबार में:
हज़रत ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० ५८३ हिजरी में मक्का शरीफ़ पहुंचे और खाना-ऐ-काबा की ज़ियारत की ! अक्सर काबा शरीफ़ का तवाफ़ करते और इबादत में मशगूल रहते ! आपने वहां बेशुमार बरकतें हासिल की ! एक दिन का वाक़िया है कि हज़रत ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० खाना-ऐ-काबा में इबादत में मशगूल थे, ग़ैब से आवाज़ आई 'ऐ मुईनुद्दीन ! मैं तुझसे राजी हूँ तुझे बख्श दिया ! जो कुछ तेरा दिल चाहे मांग ले !'
ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० यह सुनकर बहुत खुश हुए और बेख़ुद होकर सज्दे में गिर पड़े ! आपने बारगाहे इलाही में बहुत आजिज़ी से अर्ज किया: 'ख़ुदा वन्दा ! जो मेरे सिलसिले में मुरीद हों उनको बख्श दे !' उसी वक़्त आवाज़ आई!
'ऐ मुईनुद्दीन ! तेरी दुआ मक़बूल है और क़ियामत तक तेरे सिलसिले में जो दाख़िल होगा उसे बख्श दूंगा!


  • हज़रत ख्वाज़ा मुईनुद्दीन हसन चिश्ती र0 अ0 रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दरबार में:
हज़रत ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाहि  अलैहि  मदीना  मुनव्वरा  आये और बड़ी आजिज़ी से दरबारे रसूलुल्लाह में  हाज़िरी दी! रोज़ाना  मस्जिदे  नबवी में पांचो वक़्त की नमाज़ पढ़ते और  ज़्यादातर वक़्त रौज़ा-ए-अक्दस के  करीब हाज़िर रहकर दरूद व सलाम पेश करते  रहते! एक दिन सुबह के वक्त नमाज़े  फ़ज्र पढ़ने के बाद पूरी मस्जिदे नबवी के  नमाज़ी रौज़ा-ए-अक्दस के करीब दरूद  व सलाम पढ़कर अदब व एहतराम से रुखसत  होते जा रहे थे कि अचानक आवाज़ आई:  'मुईनुद्दीन को बुलाओ!
रौज़ा-ए-मुबारक के शेख़ ने मस्जिद के मेहराब में खड़े होकर आवाज़ दी: 'मुईनुद्दीन हाज़िर हों!'

इस मज़मे में जितने भी मुईनुद्दीन नाम के शख्स मौजूद थे, शेख़ की आवाज़  पर  लब्बैक-लब्बैक कहते हुए हाज़िर हों गये ! अब शेख़ हैरान हैं कि किस   मुईनुद्दीन को सरकार ने बुलाया है ! मालूम करने पर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि   वसल्लम ने फरमाया: 'मुईनुद्दीन चिश्ती को हाज़िर करो !'

ख्वाज़ा मुईनुद्दीन चिश्ती  लब्बैक-लब्बैक कहते हुए शेख़ के करीब पहुंच गये !  शेख़ ने आपको  रौज़ा-ए-अक्दस तक पहुंचा दिया और अर्ज़ किया: 'या रसूलुल्लाह  ! मुईनुद्दीन  चिश्ती हाज़िर है ! रौज़ा-ए-अक्दस का दरवाज़ा अपने आप खुल गया  और इर्शादे  नबवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हुआ:'ऐ क़ुतुबुल मशाइख अन्दर आओ !'

हुज़ूर ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़  रहमतुल्लाहि अलैहि वजदानी हालत में रौज़ा-ए-अक्दस  के अन्दर दाख़िल हुए और  तजल्लियाते नबवी में बेख़ुद व सरशार हों गये! जब  दिली सुकून हासिल हुआ तो  हुक्म हुआ: 'ऐ मुईनुद्दीन ! तू हमारे दीन का मुईन  (मददगार) है ! हमने हिंद  की खिलाफ़त तुझे अता की ! हिन्दुस्तान जा और  अज़मेर में क़ियाम कर, वही  से तब्लीगे इस्लाम करना !' ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़  रहमतुल्लाहि अलैहि बड़े अदब  व एहतराम से रौज़ा-ए-अक्दस से बाहर निकले ! आप  पर एक ख़ास कैफ़ियत तारी थी  ! जब इस हालत से बेदार हुए और दिली सुकून मिल  गया तो आपको फ़रमाने रिसालत  याद आया, मगर हैरान थे कि हिन्दुस्तान किधर है  और अज़मेर कहां है?

इसी फिक्र में थे कि शाम हों गयी और सूरज डूब गया !  इशा की नमाज़ के  बाद आँख लगी और आप सो गये! ख़्वाब की हालत में हिन्दुस्तान  का नक्शा और  अज़मेर का मन्ज़र आपके सामने था ! जब नींद से आँख खुली तो  सजदा-ऐ-शक्र अदा  किया और रौज़ा-ए-अक्दस पर हाज़िर होकर तोहफ़ा-ऐ-दरूद व सलाम  पेश करके  हिन्दुस्तान की जानिब रवाना हुए!

ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाहि अलैहि इस सफ़र का हाल ख़ुद ब्यान फरमाते है:
एक बार मै एक शहर में पहुंचा जो शाम के पास है वहां एक बुजुर्ग एक  ग़ार  (गुफा) में रहा करते थे ! उनके बदन का गोश्त (मांस) सूख गया था,  सिर्फ  हड्डियां बाकी थी ! मैं उनकी मुलाक़ात को गया, मगर उन शेरों की वजह  से अन्दर  जाने की हिम्मत न हुई ! शेख़ ने मुझे देखकर फ़रमाया: 'चले आओ, डरो  नहीं !'
यह सुनकर मैं अन्दर चला गया और अदब से बैठ गया कहने लगे, 'जब तक किसी चीज   का इरादा न करोगे वह भी तुम्हारा इरादा न करेगी ! फिर फरमाया: 'जिसके दिल   में खौफे ख़ुदा होता है, हर चीज़ उससे डरती है !'

फिर मुझसे पुछा: 'कहाँ से आना हुआ ?'
'अर्ज़ किया, बग़दाद से' कहने लगे: 'खुश आमदीद, लेकिन अच्छा यह है कि   दुरवेशों की खिदमत करते रहो, ताकि तुम्हारे अन्दर भी दुरवेशों का जौक पैदा   हों!'
फिर फरमाया: 'मुझे कई साल इस गुफ़ा में रहते गुज़र गये, एक बात से डरता हूँ ! मैंने पूछा वह क्या बात है ?
उन्होंने कहा: 'नमाज़ है जिसके अदा करने के बाद इस खौफ से कि कोई भूल चूक न   रह गयी हों और नमाज़ ही मेरे लिए इताब (अल्लाह की पकड़) हों जाए, रोता हूँ !   बस ऐ दुरवेश ! अगर नमाज़ अदा की तो सुब्हान अल्लाह वरना मुफ़्त में उम्र   बेकार हुई!'
फिर मुझे एक सेब दिया और फ़रमाया: 'कोशिश करो कि हक्के नमाज़ अदा हो जाए वरना कल क़ियामत के दिन शर्मिन्दगी होगी!
  • ख्वाज़ा साहब र० अ० दोबारा पीर व मुर्शिद की खिदमत में:
रौज़ा-ऐ-अक्दस से रुख्सत होकर ख्वाज़ा उस्मान हारुनी र०अ० वापस बग़दाद शरीफ पहुंचे ! उन दिनों आपके पीर व मुर्शिद हज़रत ख्वाज़ा उस्मान हारुनी र०अ० वापस बग़दाद शरीफ पहुंचे ! उन दिनों आपके पीर व मुर्शिद हज़रत ख्वाज़ा उस्मान हारुनी र०अ० भी बग़दाद में मौजूद थे ! आप उनकी ख़िदमत में हाज़िर हुए और इरशाद नबवी स०अ०स० से आपको आगाह किया ! यह सुनकर आप बहुत ख़ुश हुए और मुस्कराकर फ़रमाया:
'अब हम एतिकाफ़ में रहेंगे!'
हज़रत ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र०अ० रोज़ाना सूरज निकलने के बाद अपने मुर्शिद की ख़िदमत में हाज़िर होते और रूहानी तालीम हासिल करते यह सिलसिला अट्ठाईस रोज़ तक जारी रहा !
पीर व मुर्शिद से विदा होकर आप बग़दाद शरीफ से रवाना हुए और सफ़र के दौरान बदख्शां, हिरात और सब्ज्बार भी गए ! बल्ख़ से गुज़रते हुए आपने वलीये कामिल बुजुर्ग शेख़ अहमद खिजरुया र० अ० की खानकाह में कुछ रोज़ क़ियाम फ़रमाया और फिर वहां से सफ़र का सामान बांधा!
जिस वक़्त ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र०अ० का गुज़र समरकंद से हुआ तो आपने देखा कि ख्वाज़ा अबुल लैस समरकंदी र० अ० के मकान के पास ही एक मस्जिद बन रही थी!
और एक होशियार आदमी किब्ला कि सिम्त (दिशा) पर एतराज कर रहा था ! किसी तरह समझाये नहीं समझता था! आपने उसकी गर्दन पकड़कर कहा: 'देख सामने क्या है!' उसने काबा शरीफ़ देख लिया और मान गया!
इसके बाद हिरात में पहुंचकर ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० हज़रत उबैदुल्लाह अन्सारी र० अ० के मज़ार मुबारक पर हाज़िर हुए, मज़ार मुबारक पर अल्लाह तआला कि हैबत तारी थी, इसलिए आप होशियार रहते थे! वहां आपने काफ़ी समय इबादत में गुजारा! रात भर इबादत में लगे रहते! जब हिरात में आपकी शोहरत बढ़ गयी और लोग आपकी ख़िदमत में आने लगे तो आप वहां से रुख्सत हुए और सीधे हिन्दुस्तान की तरफ चल पड़े!
  • ख्वाज़ा साहब र० अ० हिन्दुस्तान की राह पर:
हिरात से कूच करके ख्वाज़ा साहब र० अ० सब्ज़ावार पहुंचे! सब्ज़ावार का हाकिम शेख़ मुहम्मद यादगार बड़ा ज़ालिम, निर्दयी और बदअख्लाक़ शख्स था! शिया मज़हब रखता था और खलीफाओं के नाम का दुश्मन था ! उसने शहर के बाहर एक बाग़ लगवाया था जो बड़ा सुन्दर था ! ख्वाज़ा साहब र० अ० उस बाग़ में दाखिल हो गए और हौज़ पर नहाये और नमाज़ अदा करके कुरआन पाक की तिलाबत करने लगे ! इत्तिकाफ़ की बात है कि बाग़ का हाकिम सैर व तफ़रीह के लिए आने बाला था! बाग़ के मालियों ने आपसे कहा कि बाग़ में न ठहरें, क्योंकि अगर हाकिम ने देख लिया तो ख़ैर नहीं ! आपने फ़रमाया: 'तुम इसका खौफ़ न करों!' इतने में ख़बर आयी कि हाकिम की सवारी आ गयी, नौकर अदब से खड़े हो गये!
ख्वाज़ा साहब के खादिम ने ख्वाज़ा साहब से अर्ज़ किया: ' बाग़ में अब बैठना मुनासिब नहीं, अगर कुछ हरज न हो तो किसी दूसरी जगह तशरीफ़ ले चले? आपने मुस्कराते हुए फ़रमाया: 'खौफ़ न करों और किसी पेड़ की आड़ में बैठकर क़ुदरत का तमासा देखों!' जब हाकिम बाग़ में आया तो आप कुरआने पाक की तिलावत कर रहे थे ! आपको अपनी गद्दी के पास ही बैठा देखकर उसको सख्त गुस्सा आया और उसने अपने नौकर को डांटा और कहा: 'इस फ़क़ीर को यहाँ से क्यों नहीं उठाया? सभी नौकर घबरा गये और खौफ़ से कांपने लगे! ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० ने जो नज़र उठाकर उसकी तरफ़ देखा तो वह हुज़ूर का रौब व जलाल देखते ही कांप उठा और बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़ा! 
मुहम्मद यादगार के नौकरों ने जब यह देखा तो बहुत परेशान हुए और ख्वाज़ा साहब की ख़िदमत में हाज़िर होकर आजिज़ी से माफ़ी मांगी और दया की दरख्वास्त की!
ख्वाज़ा साहब र० अ० ने दया करके अपने ख़ादिम को बुलाया और हुक्म दिया कि बिस्मिल्लाह पढ़ कर इसके मूंह पर पानी छिड़को! ख़ादिम ने जैसे ही उसके मूंह में पानी डाला, होश में आ गया! बहुत शर्मिन्दा हुआ और अपनी बदसुलूकी की माफ़ी मांगने लगा ! आपने उसकी बात को नज़र अंदाज़ करते हुए फ़रमाया: 'तू मुझसे माफ़ी मांगता है और रसूलुल्लाह स०अ०स० की दिल आज़ारी करता है! रसूलुल्लाह स०अ०स० के उच्च ख़ानदान के साथ मुहब्बत का दावा करना और उनकी पैरवी न करना बेमायने हैं!
हुज़ूर ग़रीब नवाज़ र० अ० महान सहाबियों के गुण कुछ इस अन्दाज़ से बयान किए कि सभी हाज़रीन दंग रह गए! शेख़ मुहम्मद यादगार और उनके साथी रोने लगे! हज़रत ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० की इस नसीहत का सब्ज़ावार के हाकिम पर बड़ा असर हुआ और वह आपका शार्गिद बन गया!
अब शेख़ ने अपना सब माल नगद और दूसरी चीज़े ग़रीब नवाज़ र० अ० की ख़िदमत में पेश कर दी, लेकिन आपने उसे क़ुबूल नहीं किया और आपके फरमान के मुताबिक शेख़ ने माल को फ़क़ीरों और अनाथों में तक्सीम कर दिया! दुनिया को छोड़कर ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० की संगत में रहने लगे ख्वाज़ा साहब ने ख़िलाफ़त अता फ़रमाकर हिसार शहर की विलायत बख्शी, मगर आप ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० की जुदाई बर्दाश्त न कर सके और हमेशा आपके साये में रहे!
  • ख्वाज़ा साहब र० अ० हिन्दुस्तान की ज़मीन पर:
सब्ज़ावार से रवाना होकर हज़रत ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० ग़ज़नी पहुंचे ! वहां सुलतान मशाइख शेख़ अब्दुल वाहिद र० अ० से मुलाक़ात हुई ! आपके साथ हज़रत कुतुबुल अक्ताब ख्वाज़ा कुतुबुद्दीन बख्तयार काकी र० अ०, शेख़ुल मशाइख हज़रत मुहम्मद यादगार र० अ० और सैय्यिदुस्सादात हज़रत ख्वाज़ा फखरुद्दीन गुरदेज़ी र० अ० भी थे !
अल्लाह वालों का यह क़ाफिला अब हिन्दुस्तान की सरहद पर था, सामने बड़े-बड़े और ऊँचे पहाड़ रास्ता रोके खड़े थे लेकिन हुज़ूर ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० का अज्म और हिम्मत उन पहाड़ों से ज्यादा अटल और मज़बूत था ! आपने अल्लाह का नाम लेकर क़दम आगे बड़ाया और उन देव जैसे पहाड़ों, घाटियों और दुश्वार रास्तों को पार करते हुए हिन्दुस्तान के सरहदी इलाक़े पंजाब में दाख़िल हो गए!
अल्लाह वालों का यह क़ाफिला आगे बढ़ता रहा! क़िला शादमान और मुलतान होता हुआ दरिया-ए-रावी के किनारे पहुंच गया! दरिया-ए-रावी के उस पार पंजाब की राजधानी लाहौर आबाद थी ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० और आपके हमराहियों ने दरिया पार करके शहर से बाहर हज़रत अली बिन उस्मान हिजवेरी उर्फ़ दाता गंज बख्श र० अ० के मज़ार पर क़ियाम फ़रमाया जो शहर के क़रीब था !
हज़रत दाता गंज बख्श र० अ० के मज़ार पर क़ियाम फ़रमाया जो शहर के क़रीब था!
हज़रत दाता गंज बख्श र० अ० अपने वक़्त के बेमिसाल आलिम-व-फ़ाज़िल, आबिद व ज़ाहिद और बड़े कामिल बुज़ुर्गों में से एक थे! हुज़ूर ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० ने यहाँ एतिकाफ़ फ़रमाया और दिली सुकून हासिल किया, फिर वहां से रवाना हुए! रवाना होते वक़्त आपने हज़रत दाता गंज बख्श र० अ० की शान में निम्नलिखित शेर पढ़ा:
गंज बख्शे फैज़े आलम मज़हरे नूरे ख़ुदा,
नाकिसांरा पीरे कामिल कामिलांरा रहनुमा!
(गंज बख्श ने दुनिया की भलाई के लिए ख़ुदा के नूर की लहर फैलाई है! गुनहगारों के लिए योग्य गुरु और जानकारों के लिए रहनुमा हैं!)
यह शेर ग़रीब नवाज़ र० अ० की ज़बाने मुबारक से अगरचे बेसाख्ता निकला था, लेकिन यह आपके सच्चे जज़्बात व एहसासात का आइनादार है और इसकी मक़बूलियत का यह आलम है कि आज तक लोग इसे बतौर वज़ीफा पढ़ते है!
ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० लाहौर से रवाना होकर शमाना (पटियाला) में पहुंचे ! वहां के लोग देखने में तो आपके हमदर्द मालूम होते थे मगर अन्दर से आपको नुकसान पहुंचाना चाहते थे! असल में बात यह थी कि दिल्ली और अजमेर के राजा पृथ्वीराज की मांग इल्मे नुजूम (ज्योतिष विद्या) की जानने वाली थी ! उसने अपने इल्म से अपने बेटे को आगाह (सचेत) कर दिया था कि ऐसी शक्ल व सूरत और हुलिया का एक शख्श उसके राज्य में आयेगा जो तेरी तबाही का कारण बनेगा ! राजा ने इसी कथन के अनुसार चित्रकारों से तस्वीरें बनवायीं और सरहदों पर भेज दीं! साथ ही साथ यह हुक्म दिया कि इस सूरत का शख्स जहां भी मिले तुरंत क़त्ल कर दिया जाए! जब ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० शमाना में पहुंचे तो राजा के आदमियों ने आपको उसी श़क्ल व सूरत का पाकर आपको रोकना चाहा! ख्वाज़ा साहब को बज़रिये कसफ़ मालूम हो गया कि मेज़बानों की नीयतें बिगड़ी हुई हैं और वे लोग आपके साथ दग़ा फरेब करना चाहते हैं, इसलिए आप अपने हमराहियों को लेकर वहां से इस तरह निकल गये कि दुश्मनों को ख़बर तक न हुई!
  • देहली में आगमन:
शमाना से रवाना होकर ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० देहली पहुंचे ! आपने देहली में राजा खांडे राव के महल के सामने कुछ फ़ासले पर अपना क़ियाम फ़रमाया और इस्लाम फैलाने का काम शुरू कर दिया! आपका अन्दाज़े तबलीग़ इतना दिलनशीन और आपकी ज़ाते अक्दस इस क़दर पुरकशिश थी कि आपके पास आने वालों में ज्यादातर लोग ईमान ले आते थे ! धीरे-धीरे मुसलामानों की तायदाद बढ़ना शुरू हो गयी और कुछ ही समय में देहली में इस्लाम के इस तेज़ी से फैलने से तहलका मच गया! आख़िरकार शहर के कुछ बा-असर लोग खांडे राव हाकिम के पास गये और अर्ज़ किया कि इन मुसलमान फकीरों की आमद से हमारे देवता नाराज़ हो गये हैं! अगर तुरंत इनकों यहां से निकाला नहीं गया तो डर है कि देवताओं का क़हर सल्तनत की तबाही का कारण बन जाएगा! खांडे राव ने हुक्म जारी कर दिया कि फकीरों को देहली से तुरंत निकाल दिया जाए, लेकिन उसकी कोई चाल कामियाब न हुई क्योंकि हुकूमत के आदमी जब कोई कार्यवाही करने के लिए आपके पास आते तो आपके बर्ताव, उच्च व्यक्तित्व और सत्यवादिता से इस तरह आकर्षित होते कि तुरन्त इस्लाम क़ुबूल करके आपके जांनिसारों में शामिल हो जाते! खांडे राव का जब कोई बस न चला तो उसने एक शख्स को कुछ लालच देकर इस बात पर राज़ी कर लिया कि वह सरकार ग़रीब नवाज़ र० अ० को क़त्ल कर दे ! वह शख्स अकीदतमंद बन कर हाज़िर हुआ, आप पर इसकी आमद का मक़सद ज़ाहिर हो गया और आपने फ़रमाया: इस अकीदतमंद से क्या फ़ायदा, जिस काम के लिए आया है क्यों नहीं करता!'
इस बात को सुनकर वह कांपने लगा और बग़ल में दबा हुआ ख़ंजर ज़मीन पर गिर पड़ा! इस रोशन ज़मीरी को देखकर वह शख्स आपके क़दमों में गिर पड़ा और ईमान लाकर इस्लाम में दाख़िल हो गया!
जब ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० ने यह देखा कि अब देहली में इस्लाम की काफ़ी चर्चा हो चुकी है, तो आपने अपने ख़लीफ़ा-ए-अकबर हज़रत ख्वाज़ा क़ुतुबुद्दीन बख्तियार काकी र० अ० को इस्लाम फैलाने के लिए वहां छोड़ा और ख़ुद अपने चालीस जांनिसारों के साथ अजमेर के लिए रवाना हो गये! इस सफ़र में आपने तबलीग़ व हिदायत का काम इस सुन्दर तरीक़े से अन्जाम दिया कि अजमेर पहुंचते- पहुंचते सैकड़ों आदमी आपके साए में ईमान लाकर मुसलमान हो चुके थे!
  • सुल्तानुल हिन्द अजमेर में:
अजमेर पहुंचकर आपने शहर से बाहर एक सायादार पेड़ के नीचे क़ियाम फ़रमाया ! अभी बैठे ही थे कि चन्द ऊंट वालों ने आकर बड़े सख्त शब्दों में कहा: 'यहां से हट कर कहीं और बैठो, यह जगह राजा के उंटों के बैठने की है ! हुज़ूर ग़रीब नवाज़ र० अ० ने कहा: 'उंटों को कहीं भी बिठा सकते हो, बहुत जगह पड़ी है !' मगर ऊंट वाले न माने और ज़बरदस्ती पर उतर आए! इसलिए सरकार ग़रीब नवाज़ र० अ० ने नर्मी से फ़रमाया: 'लो बाबा! हम यहाँ से उठ जाते हैं, तुम्हारे ऊंट ही बैठे रहेंगे!'
यह कहकर आप अपने मुरीदों के साथ आना सागर के किनारे जाकर एक पहाड़ी पर ठहर गये ! दूसरी सुबह ऊंट वालों ने लाख कोशिश की मगर उंट खड़े न हो सके! ऐसा मालूम होता था कि ज़मीन ने उन्हें पकड़ लिया है! यह हालत देखकर ऊंट वाले बहुत परेशान हुए, जब कोई तरकीब काम न आई तो मजबूर होकर राजा पृथ्वीराज के दरबार में तारागढ़ पर हाज़िर हुए ! राजा ने जब उनकी ज़बानी यह अजीब व ग़रीब माजरा सुना तो हैरत में पड़ गया! उसे अपनी बहादुरी पर बड़ा नाज़ था, लेकिन ख्वाज़ा साहब र० अ० की इस पहली ही करामत से उसकी सारी बहादुरी धरी की धरी रह गयी ! लाचार होकर उसने ऊंट वालों को हुक्म दिया कि जाओ उसी फ़क़ीर से माफ़ी मांगो! सब ऊंट वालों ने हुज़ूर ग़रीब नवाज़ र० अ० की ख़िदमत में हाज़िर होकर बहुत आजिज़ी से माफ़ी मांगी, आपने माफ़ कर दिया और फ़रमाया: 'जाओ! ख़ुदा की मेहरबानी से तुम्हारे ऊंट खड़े हो जायेंगे ! ऊंट वालों ने जब वापस आकर देखा तो उनकी ख़ुशी और आश्चर्य की सीमा न रही क्योंकि उनके सब के सब ऊंट खड़े थे!
हुज़ूर ग़रीब नवाज़ र० अ० और आपके साथी रोज़ आना सागर के पास घाट पर वुज़ू और ग़ुस्ल (स्नान) किया करते थे, मन्दिरों के पुजारियों को यह बात सख्त नागवार गुज़री ! एक दिन हुज़ूर ग़रीब नवाज़ र० अ० के कुछ मुरीद आना सागर पर नहाने के लिए गये, मगर ब्राह्मणों ने उन्हें रोक दिया और सख्ती पर उतर आये ! मुरीद फ़रियाद लेकर ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० की ख़िदमत में हाज़िर हुए ! आपने पूरा हाल सुनकर अपने एक मुरीद से फ़रमाया: 'जाओ, कूज़े में तालाब का पानी भर लाओ! वह मुरीद आना सागर पर पहुंचकर तालाब का पानी भरने के लिए जैसे ही कूज़े को तालाब में डाला, आना सागर का सारा पानी उस कूज़े में आ गया ! मुरीद ने कूज़े को हुज़ूर की ख़िदमत में पेश कर दिया ! जब तालाब के सूखने का पुजारियों को पता चला, तो उनके होश उड़ गये ! उधर शहर में कोहराम मच गया ! लोग पानी के लिए तड़प उठे और यह बात पूरे शहर में फ़ैल गयी कि मुसलमान आना सागर पर नहाने के लिए गये, मगर ब्राह्मणों ने उन्हें रोक दिया था इसलिए उनके गुरु ने सारा पानी ग़ायब कर दिया है! शेहरियों का एक गिरोह सरकार ग़रीब नवाज़ र० अ० से बड़ी मन्नत व समाजत से माफ़ी मांगने लगा!  आपने दयापूर्वक उस कूज़े का पानी वापस तालाब में डलवा दिया और तालाब पहले जैसा पानी से भर गया! इस वाक़िया को देखकर बहुत से लोग ईमान ले आये और इन करामात के बाद अजमेर में इस्लाम बड़ी तेज़ी से फैलने लगा!
  • आग पूजने वालों का गिरोह:
एक बार जब कि आप अपने मुरीदों के साथ सफ़र कर रहे थे, आपका गुज़र एक जंगल से हुआ! वहां आतिश परस्तों (आग पूजने वालों) का एक गिरोह आग की पूजा कर रहा था! उनकी रियाज़त इस क़दर बढ़ी हुई थी कि छ: छ: माह तक बगैर खाए-पिए रह जाते थे!
अक्सर उन की सख्त रियाज़त से लोग इस क़दर प्रभावित होते कि उन से अक़ीदत रखने लगते! उन की इस हरकत से लोग गुमराह होते जाते थे! ख़्वाजा साहब र०अ० ने जब उनकी यह हालत देखी तो उन से पूछा: 'ऐ गुमराहों! ख़ुदा को छोड़कर आग की पूजा क्यों करते हो?' उन्होंने अर्ज़ किया: 'आग को हम इसलिए पूजते हैं कि यह हमें दोज़ख़ में तक्लीफ़ न पहुंचाए!' आप ने फ़रमाया यह तरीक़ा दोज़ख़ से छुटकारे का नहीं है! जब तक ख़ुदा की इबादत नहीं करोगे कभी आग से निजात न पाओगे! तुम लोग इतने दिनों से आग को पूज रहे हो, ज़रा इसको हाथ में लेकर देखो तो मालूम होगा के आग पूजने का क्या फ़ायदा है?'
 उन्होंने जवाब दिया कि 'बेशक यह हम को जला देगी! क्योंकि आग का काम ही जला देने का है!
आपने जोश में आकर फ़रमाया: 'ऐ आग अगर ये जूतियां ख़ुदा के किसी मक्बूल बन्दे की हैं तो उसको ज़रा भी आंच न आए!' जूतियों का आग में पहुंचना था कि तुरन्त आग बुझ गयी और जूतियां सही सलामत निकल आई! इस करामात को देखकर आग पूजने वालों ने कलिमा पढ़ लिया और दिल से मुसलमान हो गये!
  • शादी देव का ईमान लाना:
अजमेर के सभी बुतखानों का पेशवा शादी देव था जादू शादी मंदिर में रहता था ! हिन्दू धर्म का बड़ा जानकार शख्स था और सब पुजारियों का सरदार था ! पूरी जनता पर उसका असर था जब उसने बुतखानों की वीरानी के आसार देखे तो तिलमिला उठा और बहुत चिंतित हुआ मन्दिरों के पुजारियों ने भी इसको ख्वाज़ा साहब की मुखालफ़त पर उभारा ! मन्दिरों के सब रहने बालों ने मिलजुल कर शादी देव को आपके मुक़ाबले पर ला खड़ा किया ! उनकी नीयत बुरी थी और ख्वाज़ा साहब को नुक्सान पहुंचाना चाहते थे, मगर ख्वाज़ा साहब र० अ० ने उन पर एक ऐसी नज़र डाली कि सब के सब थरथरा कर कांपने ! शादी देव तुरन्त हुज़ूर के क़दमों पर गिर पड़ा और आजिज़ी से माफ़ी मांगने लगा ! ख्वाज़ा साहब र० अ० ने उसे कालिमा-ए-हक़ पढ़ाया और उसने ख़ुशी से इस्लाम क़ुबूल कर लिया ! उसका इस्लामी नाम शाद रखा गया! उसके हमराहियों में से भी अक्सर ने तौबा की और ईमान ले आये ! इस घटना से सब जगह हलचल मच गयी और पृथ्वीराज भी चिंतित हो गया!
  • अजय पाल योगी का मुसलमान होना:
अजमेर में इस्लाम तेज़ी से फैलने पर पृथ्वीराज को बहुत चिन्ता हो गयी थी! इसलिए उसने हुज़ूर ग़रीब नवाज़ र० अ० के मुक़ाबले के लिये अपने ख़ानदानी गुरु की मदद ली, जिसका नाम अजय पाल योगी था! अजय पाल हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा और बा कमाल जादूगर था जो अजमेर के पास ही जंगल में रहता था! राजा ने बुलाकर ख्वाज़ा साहब का सब हाल उसे सुना दिया! अजय पाल योगी ने राजा को यकीन दिलाया कि उस फ़क़ीर को यहाँ से निकाल दूंगा! मृग छाल पर बैठा और अपने सभी शागिर्दों को साथ लेकर आना सागर की तरफ़ रवाना हुआ जहां सरकार ग़रीब नवाज़ र० अ० ठहरे हुए थे! शैतानों का यह लश्कर उड़न शेरों पर सवार हाथों में अजगरों के कोड़े लिए हुए जंगलियों की तरह चिल्लाते-चिल्लाते आना सागर के किनारे आ जमा, हुज़ूर ग़रीब नवाज़ र० अ० के नये शागिर्द उस शैतानी लश्कर को देखकर घबरा गये! उसी वक़्त आपने अपनी उंगली से लकीर खींच दी और फ़रमाया: 'इसके बाहर न जाना, महफूज़ रहोगे!'
अजय पाल और उसके चेलों ने अपने हाथों से जादू के अजगर छोड़ दिये जो हज़रत की तरफ़ बड़ी तेज़ी से लपके, मगर उस लकीर तक आकर सब के सब जल गये! इस तरकीब के नाकाम होने से जादूगरों ने आग बरसाना शुरू किया, मगर उस आग ने भी सरकार ग़रीब नवाज़ र० अ० और आपके साथियों पर कोई असर नहीं किया बल्कि वह आग वापस लौट गई और उससे जादूगर ही जल कर ख़ाक होने लगे! जब उसका कोई करतब कारगर न हुआ तो अजय पाल ने तय किया कि आसमान पर पहुंचकर वार किया जाये! वह आसमान की तरफ़ उड़ने लगा ताकि हवा में रहकर हमला कर सके! जब हुज़ूर ग़रीब नवाज़ र० अ० की नज़र उस पर पड़ी तो आपने अपनी जूतियों को इशारा किया कि उस बेदीन को नीचे उतार लायें! जूतियों ने उड़ान भरी और आन की आन में अजय पाल के सिर पर पहुंचकर तड़ातड़ पड़ने लगीं! थोड़ी देर बाद क्या देखते हैं कि जूतियां अजय पाल के सिर पर मुसल्लत (छा गई) हैं और वह लाचार नीचे उतरा चला आ रहा है! आख़िर घमंड का सर नीचे हुआ! अजय पाल की आंखों से अब पर्दे उठ चुके थे और उसने समझ लिया था कि जादू बेकार है! आज तक जादू सीखने में ज़िन्दगी बर्बाद की इसलिये आंखों में आंसू भर लाया और माफ़ी मांगी! ख्वाज़ा साहब र० अ० ने दया करके उसे माफ़ कर दिया और वह सच्चे दिल से मुसलमान होकर आपके चाहने वालों में शामिल हो गया! हुज़ूर ने उसका इस्लामी नाम अब्दुल्लाह रखा! उसके बाक़ी चेले भी मुसलमान हो गये और जितने आदमियों ने किनारे पर यह घटना देखी वे सब भी मुसलमान हो गये!
अजय पाल ने ईमान लाने के बाद हुज़ूर ग़रीब नवाज़ की ख़िदमत में इल्तिजा की कि हुज़ूर अपने मदारिजे आला से आगाह फ़रमायें आपने मुस्कुराकर फरमाया: 'आंखें बंद करो!' आंखें बंद करते ही उसने देखा कि तमाम हिजाबात (पर्दे) उठना शुरु हो गये और आलमे बरज़ख, आसमान और यहां तक की अर्शे आज़म तक की सैर करा दी! जब उसकी तबीयत सैर हो गयी तो हुक्म दिया कि आंखें खोलो, आंखें खोलकर हुज़ूर के क़दमों पर गिर पड़ा! अब उसने एक और इल्तिजा पेश कि की मैं हयाते अबदी का तालिब हूँ! हुज़ूर ने बारगाहे ख़ुदावन्दी में अर्ज़ गुज़ारी जिस पर शरफे क़बूलियत हासिल हो गया! 
  • इस्लाम का तेज़ी से फैलना:
अजय पाल योगी के मुसलमान होते ही एक तहलका पूरे अजमेर शहर में मच गया था और लोग ख्वाज़ा साहब र० अ० से अक़ीदत मंदी का इज़्हार करने लगे! शादी देव और अजय पाल ने मुसलमान होने के बाद ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० की ख़िदमत में हाज़िर होकर आबादी में क़ियाम फ़रमाने की अपील की! आपने आना सागर से उठकर उस जगह आकर क़ियाम किया जहां आजकल दरगाह शरीफ़ है! यह जगह शादी देव की मिलकियत में थी!
इस घटना से राजा बहुत मुतास्सिर और चिन्तित हुआ और उसके सीने में ग़ुस्से की आग भड़कने लगी! उधर हुज़ूर ग़रीब नवाज़ र० अ० ने इस्लाम फैलाने का काम और तेज़ कर दिया! अल्लाह तआला ने आपको असल में ऐसी नज़र अता फरमाई थी! कि जिसपर एक बार नज़र डाल देते आपकी मुहब्बत में डूब जाता, आपकी ज़बान में इतनी मिठास थी कि हर आने वाला आपकी मेहमान नवाज़ी और हमदर्दी से असर अन्दाज़ होकर आपके साथ हो जाता! लोग आपकी ख़िदमत में भारी तायदाद में आने और मुसलमान होने लगे! इस तरह हज़ारों आदमी कुफ़्र (नास्तिक) के अंधेरे से निकलकर इस्लाम की रोशनी में आ गये! 
  • पृथ्वीराज को दावते इस्लाम:
शादी देव और अजय पाल के इस्लाम क़ुबूल करने के बाद हुज़ूर ग़रीब नवाज़ र० अ० ने पृथ्वीराज के पास पैग़ाम भेजा कि: 'इस्लाम क़ुबूल करो!' इसी में तुम्हारी भलाई है! बादशाहत भी हाथ से न जायेगी और मरने के बाद भी चैन मिलेगा वरना ख़ूब याद रखों कि तुम्हारे लिये यहां और वहां बड़ी मुसीबत का सामना है और उस वक़्त तुमसे कुछ बनाये न बन पड़ेगा!'
मगर उसके दिल पर कुछ असर न हुआ और ख्वाज़ा साहब का यह पैग़ाम सुनते ही आग बगोला हो गया! उसने इम्तिहान लेने के लीए एक शख्स को हुज़ूर की ख़िदमत में मुरीद होने के लिए भेजा! जब उसने हुज़ूर की ख़िदमत में हाज़िर होकर मुरीद बनना चाहा आपने उसे मुरीद बनाने से इन्कार कर दिया! मालूम होने पर आपने फ़रमाया कि मुरीद न करने के तीन कारण हैं! पहला यह कि तेरे दिल में दग़ा और गन्दगी है! दूसरा यह कि शिर्क तेरी तबियत में इस तरह बसा हुआ है कि तू ख़ुदा के सिवा हर एक के सामने सर झुकायेगा! तीसरा यह कि तेरे लिए लौहे महफ़ूज़ में देखा है कि तू दुनिया से बेईमान जाएगा! यह सुनकर वह शख्स हैरान हो गया और राजा की ख़िदमत में जाकर सब हाल बयान कर दिया!
ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र० अ० और पृथ्वीराज के बीच कशमकश बराबर जारी थी और अब दुश्मनी और भी बढ़ गयी! राजा का जब किसी तरह हुज़ूर ग़रीब नवाज़ र० अ० पर बस न चला तो उसने सारे मुसलमानों पर ज़ुल्म ढाने शुरू कर दिये! उसका एक दरबारी जो मुसलमान होकर ख्वाज़ा साहब र० अ० का मुरीद हो गया था उसकों ख़ूब तकलीफें दी गयीं! उस मुरीद ने ख्वाज़ा साहब र० अ० की ख़िदमत में हाज़िर होकर फ़रियाद की कि सिफ़ारिश की जाये ताकि राजा अपने ज़ुल्म से बाज़ आये! ख्वाज़ा साहब की मुरीद नवाज़ी मशहूर है! आपने राजा को इससे बाज़ रहने की सिफ़ारिश की लेकिन राजा ने एक न मानी और ग़ुस्से में हुक्म दिया कि यहां के राजा होने के नाते हमारा हुक्म है कि एक हफ़्ते के अन्दर अपने साथियों समेत अजमेर खाली कर दो वरना सख्ती से निकाल दिया जायेगा! जब यह हुक्मनामा हमारे ख्वाज़ा साहब र० अ० के पास पहुंचा तो आपको जलाल आ गया और फ़रमाया: 'हमने पृथ्वीराज को ज़िंदा गिरफ़्तार करके लश्करे इस्लाम के हवाले कर दिया!' ख्वाज़ा साहब र० अ० की ज़बाने मुबारक से यह जुमला सुनकर लोग हैरान थे, मगर उन्हें बेहद यक़ीन था कि ख्वाज़ा साहब र० अ० ज़बान से निकली हुई बात बेअसर नहीं हो सकती बड़ी बेक़रारी से नतीजे का इन्तिज़ार करने लगे!
  • शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी को फ़तह की खुशखबरी:
जिस रोज़ हुज़ूर ख्वाज़ा की ग़रीब नवाज़ र० अ० की ज़बाने मुबारक से यह जुमला निकला 'हमने पृथ्वीराज को ज़िंदा गिरफ़्तार करके लश्करे इस्लाम के हवाले कर दिया!' उसी रोज़ सुल्तान शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी को जो उन दिनों खुरासान में था, ख़्वाब में बशारत हुई! देखता क्या है कि एक बा-ख़ुदा बुज़ुर्ग सामने खड़े हैं और फ़रमा रहे हैं: 'ऐ शहाबुद्दीन! ख़ुदा-ए-तआला ने हिन्दुस्तान की सल्तनत तुझे अता फ़रमाई है, उठ इस तरफ़ ध्यान दे और उस राजा को ज़िन्दा गिरफ़्तार करके सज़ा दे!'
यह कहकर वह बुज़ुर्ग रूपोश हो गए! बादशाह जब ख़्वाब से बेदार हुआ तो उसके दिल पर एक अजीब कैफ़ियत थी और उसके कान में एक ग़ैबी आवाज़ रह-रहकर आ रही थी, 'उठ हिन्दुस्तान चल, सफलता तेरा इन्तिज़ार कर रही है!' सुल्तान ने अपना ख़्वाब आलिमों से बयान किया! सब ने एक ज़बान होकर सुल्तान को मुबारकबाद दी और फ़तह की खुशखबरी सुनाई!
  • शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी हिन्दुस्तान के मोर्चे पर:
सुल्तान के मुबारक ख़्वाब ने उसके दिल में एक नया जोश पैदा कर दिया था! आलिमों से अपने ख़्वाब की ताबीर सुनते ही उसने लड़ाई के सामान की फ़ेहरिस्त (सूची) मंगवा कर देखी और लश्कर के कूच का डंका बजवा दिया और आठवें दिन खुद रिकाब में पैर रखकर रवाना हुआ! सभी अफ़सर हैरत में थे कि इस क़दर जल्द तैयारी की क्या वजह हुई और यह लश्कर किस मोर्चे पर जा रहा है मगर किसी की हिम्मत न हुई कि सुल्तान से मालूम करे! जब यह लश्कर पेशावर में आकर ठहरा तो शाही ख़ानदान के एक उम्र रसीदा शख्स ने सुल्तान की ख़िदमत में हाज़िर होकर अर्ज़ किया:'हुज़ूर इस मोर्चे में सामान तो जंगे अज़ीम (महायुद्ध) का दिखाई है लेकिन यह नहीं खुलता कि जाना किधर है?' सुल्तान ने उस बुजुर्ग को ख़्वाब की ताबीर सुना दी!
बुजुर्ग ने यह सुनकर शहाबुद्दीन गौरी की हिम्मत बढ़ाई और उसको दुआयें दीं, फ़तह का यक़ीन दिलाया और फ़रमाया:'अगर हुज़ूर का यही इरादा है तो मसलहते वक़्त को देखते हुए काम करना चाहिए! आप उन अमीरों और सरदारों को दरबार में बुलाकर इकराम से मालामाल करें ताकि वह जान की बाज़ी लगाकर लड़ें!' सभी सरदारों ने अपनी तलवारों के क़ब्ज़े पर हाथ रखकर झुका दिया, कि हमारा वायदा पक्का है और हम उसे आखिरी सांस तक निभायेंगे!
  • पृथ्वीराज को सुल्तान का पैग़ाम:
सुल्तान शहाबुद्दीन मुलतान से रवाना होकर लाहौर पहुंचा वहां से रुकनुद्दीन को सफ़ीर (सन्देशवाहक) बनाकर राजा पृथ्वीराज के पास अजमेर भेजा! पृथ्वीराज के नाम जो पैग़ाम सुल्तान ने भेजा था उसका मज्मून था: 'मैं अपने बड़े भाई के हुक्म से जो पंजाब से लेकर ख़ुरासान तक सभी मुसलमानों का बादशाह है हिन्दुस्तान पर लश्कर कशी करने के लिए आया हूँ इसलिए पृथ्वीराज को जो हिन्दुस्तान के राजाओं का महाराजा है लिखा जाता है कि वह इस्लाम को कुबूल करके राज्य में खून-खराबा न होने दे वरना लड़ाई के लिए तैयार हो जाये! पृथ्वीराज की नज़र से जब यह पैग़ाम गुज़रा तो उसकी कोई परवाह नहीं की और बहुत सख्त जवाब दिया क्योंकि उसको अपनी बहादुरी और राजपूत सूरमाओं पर बहुत नाज़ था! उसको अपनी सफलता सामने ही नज़र आ रहीं थी! लड़ाई की तैयारी में लग गया, तुरन्त सभी हिन्दुस्तान के राजाओं को संदेश जारी कर दिया! थोड़े ही समय में तीन लाख राजपूतों का लश्कर इसके झंडे के नीचे आ जमा!
सुल्तान मुहम्मद गौरी उधर से बढ़ा, इधर से पृथ्वीराज की संयुक्त फ़ौज चली और सरस्वती नदी को बीच में डालकर दोनों लश्करों ने अपने-अपने ख़ेमे लगा दिये! उसी समय सुल्तान के पास पृथ्वीराज का जवाब भी आ गया जिसका मज्मून यह था: 'इस्लाम के सिपहसलार को उसके जासूसों द्वारा मालूम हो गया होगा हमारे पास आसमान के तारों से भी ज़्यादा लश्कर मौजूद है और अभी हिन्दुस्तान के कोने-कोने से फौजों का आना जारी है! तुम इन तुर्क बच्चों और अफ़गान जवानों की जवानी पर रहम खाते हुए यहाँ से वापस लौट जाओ! इसी में तुम्हारी भलाई है वरना देख लो हमारे पास बेशुमार लड़ाई का सामान मौजूद है और जंगी हाथी भी तीन हज़ार से ऊपर हैं! अगर मेरी राय मंजूर है तो ठीक, वरना याद रखो तुम्हारा एक सिपाही भी यहां से ज़िंदा वापस जाने में कामियाब नहीं होगा!'

  • फ़ैसला कुन जंग:
शहाबुद्दीन गौरी ने शाम से ही लश्कर बन्दी का हुक्म दे दिया! खेमों और ढेरों को उसी हालत में छोड़कर रातों रात कई मील का चक्कर काटकर पूरे लश्कर पूरे लश्कर के साथ नदी से पार उतर गया ! राजा ने एक हिस्सा फ़ौज को तुरंत तैयार करके सामने ले आया फिर बाक़ी फ़ौज को भी समेट कर मैदान में ला खड़ा किया! राजा की फ़ौज में तीन हज़ार हाथी, तीन लाख सवार और बेशुमार पैदल थे! उधर सुल्तान शहाबुद्दीन के पास सिर्फ़ एक लाख बीस हज़ार का लश्कर था इसलिए राजा को अपनी कामियाबी का पूरा-पूरा यक़ीन था! इसलिए उसने लश्कर की तर्तीब पर कोई खास ध्यान नहीं दिया! सारी फ़ौज को एक ही समय में हमले का हुक्म दें दिया उधर सुल्तान ने तर्कीब से काम लेते हुए अपनी फ़ौज के चार हिस्से किये और हर एक पर अलग-अलग सिपहसालार मुक़र्रर करके बारी-बारी जाकर लड़ने का हुक्म दे दिया!
लड़ते-लड़ते दोपहर का समय हो गया, सूरज सर पर आ गया, गर्मी का मौसम था और जंग थी के ख़त्म न होती थी! राजा पृथ्वीराज एक सौ पचास राजाओं को साथ लेकर लश्कर से निकला और एक पेड़ के साये में पहुंचकर तय किया कि अब एक फैसलाकुन जंग लड़ी जाये! इस पर सब ने तलवारों के क़ब्ज़े पर हाथ रखकर देश पर कट मरने की क़सम खाई, शरबत का एक-एक प्याला पिया, तुलसी की पत्ती ज़बान पर रखी और केसर का टीका अपने माथे पर लगाया और ताज़ा दम होकर मैदान में आ गये! अब घमासान की लड़ाई शुरू हो गयी! राजा की फ़ौज सुबह से लड़ते-लड़ते थक चुकी थी! सुल्तान मौक़ा पाकर अपने बाहर हज़ार तलवारबाज़ बहादुरों को लेकर जो इसके ख़ास ग़ुलाम थे और अब तक जंग में नहीं गये थे लश्कर से निकला और इस तेज़ी से हमला किया कि आन की आन में राजा की फ़ौज के बीच में घुस गया! सुल्तान के दुसरे सरदारों भी दायें-बायें ज़ोर देकर राजा की फ़ौज पर टूट पड़े! ताज़ा दम दस्ते का मुक़ाबला राजा की थकी हुई फ़ौज के बस से बाहर था देखते ही देखते हज़ारों राजपूत तलवार के घाट उतर गये और राजा की फ़ौज में हलचल मच गयी! उधर जंगी हाथी जिन पर राजा को बड़ा नाज़ था अपनी ही फ़ौज पर उलट पड़े और हज़ारों को कुचल डाला! राजपूत सूरमाओं ने बड़ा संभाला लिया मगर उनके बनाए क्या बनता था! ग़रीब नवाज़ र० अ० का ज़बाने मुबारक से निकला वाक्य पूरा होना था और होकर रहा! अभी थोड़ा दिन बाक़ी था की राजा की फ़ौज के पैर उखड़ गये और सुल्तान शहाबुद्दीन की फ़ौज उन पर छा गयी! खांडे राव मैदाने जंग में मारा गया और बहुत से हिन्दुस्तान के राजा इस लड़ाई में काम आ गये, बाक़ी अपनी जान बचाकर भागने में कामियाब हो गये! पृथ्वीराज भी जान बचाकर भागना चाहता था मगर दरिया-ए-सरस्वती के किनारे गिरफ़्तार कर लिया गया!
आख़िरकार शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी की फ़तह हुई इस जंग से उत्तरी हिन्दुस्तान पर मुसलमानों का क़ब्ज़ा पूरी तरह से हो गया उसके बाद सरस्वती, सामाना, कोहराम हांसी की राजपूत रियासतें आसानी से जीत ली गयीं! अब सुल्तान ने अजमेर का रुख़ किया! रास्ते में कोई मुक़ाबला नहीं हुआ बल्कि मरे हुए राजाओं के बेटों ने सुल्तान का शानदार इस्तक़बाल (स्वागत) किया और उसकी शरण में आ गये! सुल्तान ने अजमेर पहुंच कर यहां की हुकूमत पृथ्वीराज के एक बेटे कोला को दी और उससे वफ़ादारी का हलफ़ लिया!
  • सुल्तान की नज़र सरकार ग़रीब नवाज़ र० अ० के चेहरे मुबारक पर:
जिस वक़्त शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी अजमेर में दाख़िल हुआ तो शाम का वक़्त था और सूरज डूब रहा था! इतने में अज़ान की आवाज़ आई! सुल्तान हैरत में पड़ और मालूम किया कि यह आवाज़ कहां से आ रही है! लोगों ने बताया कि कुछ फ़क़ीर आये हुए हैं! सुल्तान अज़ान की तरफ बढ़ा! जमाअत तैयार थी सुल्तान जमाअत में शामिल हो गया! सरकार ग़रीब नवाज़ र० अ० इमामत फ़रमा रहे थे! जब नमाज़ ख़त्म हुई और सुल्तान की नज़र सरकार ग़रीब नवाज़ र० अ० के चेहरे मुबारक पर पड़ी तो उसके हैरत की कोई इन्तिहा न रही, उसने देखा की ये वही बुज़ुर्ग है जिन्होंने मुझे ख़्वाब में फ़तेह की खुशखबरी दी थी, तुरंत क़दमों में गिरना चाहा लेकिन सरकार ने सुल्तान को सीने से लगा लिया! सुल्तान की आँखों में आंसू आ गये और बहुत देर तक रोता रहा सरकार ग़रीब नवाज़ र० अ० ने दुआयें देकर बैठने को कहा! सुल्तान एक तरफ़ अदब से बैठ गया! जब रोना कम हुआ तो अक़ीदत व मुहब्बत का नज़राना पेश करते हुए मुरीद होने की इल्तिजा की! सरकार ग़रीब नवाज़ र० अ० ने सुल्तान शहाबुद्दीन की दरख्वास्त मंज़ूर करते हुए उसको अपने मुरीदों में शामिल कर लिया!
कुछ दिन अजमेर में रहकर
सुल्तान शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी ने ख़ुद जाकर देहली पर क़ब्ज़ा किया और अपने वफ़ादार ग़ुलाम क़ुतुबुद्दीन ऐबक को हिन्दुस्तान का गवर्नर बनाकर वापस ग़ज़नी चला गया!
क़ुतुबुद्दीन ऐबक को हिन्दुस्तान का गवर्नर बनाकर वापस ग़ज़नी चला गया! क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने मुल्क के बाक़ी हिस्सों को फ़तह करने में हैरतअंगेज कामियाबी हासिल  की और बहुत जल्द उत्तरी हिन्दुस्तान पर मुसलमानों का क़ब्ज़ा हो गया!
एक राजा हरिराज ने अजमेर से पृथ्वीराज के बेटे को निकाल बाहर किया! उसने क़ुतुबुद्दीन ऐबक से फ़रियाद की! क़ुतुबुद्दीन ने राजा हरिराज पर चढ़ाई करके उसको क़त्ल किया और कोला फिर अजमेर का राजा बन गया लेकिन इसके साथ ही मीरां सैयद हुसैन र० अ० को अपना नायब बनाकर भेजा जो बड़े परहेज़गार बुज़ुर्ग थे! मीरां सैयद हुसैन मशहदी र० अ० पहले ही से सरकार ग़रीब नवाज़ र० अ० के अकीदतमंद थे और अब इस क़दर अक़ीदत बढ़ गयी कि ज़्यादा वक़्त सरकार ग़रीब नवाज़ र० अ० की खिदमत में बसर होता था! आपने इस्लाम फैलाने में नुमायां हिस्सा लिया!
  • मक़तूल (मुर्दा) ज़िन्दा होना:
एक रोज़ एक औरत रोती-चिल्लाती आपकी ख़िदमत में हाज़िर हुई! बदहवासी व बेताबी में आपसे अर्ज़ करने लगी: 'हुज़ूर शहर के हाकिम ने मेरे बेटे को बेकुसूर क़त्ल कर दिया है, ख़ुदा के लिए आप मेरी मदद कीजिये!
उस औरत की दर्द भरी फ़रियाद से आपके अन्दर रहम व हमदर्दी पैदा हो गयी! आप तुरन्त असा-ए-मुबारक हाथ में लेकर उठे और उस औरत के साथ रवाना हो गये! जब आप लड़के की लाश के पास पहुंचे तो चुप रहे और खड़े-खड़े उसकी तरफ़ तकते रहे, फिर आगे बढ़े और उसके ज़िस्म पर हाथ रखकर फ़रमाया: 'ऐ मक़तूल! अगर तू बेगुनाह मारा गया है तो अल्लाह के हुक्म से ज़िन्दा हो जा!' अभी आपकी ज़बाने मुबारक से ये शब्द निकले ही थे कि मक़तूल (मुर्दा) ज़िन्दा हो गया!
  • विसाले ख़्वाजा र० अ०:
६३३ हिजरी शुरू होते ही ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र०अ० को मालूम हो गया कि यह आख़िरी साल है! आपने अपने मुरीदों को ज़रूरी हिदायतें और वसीयतें फ़रमाई! जिन लोगों को ख़िलाफ़त देनी थी उन लोगों को ख़िलाफ़त से सरफ़राज़ फ़रमाया और साथ ही ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख्तियार काकी र०अ० को अजमेर में बुलवाया! हुज़ूर ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र०अ० एक रोज़ अजमेर की जामा मस्जिद में तशरीफ़ फरमा थे! मुरीद और अकीदतमंद अहबाब हाज़िरे खिदमत थे! आप मलकुल मौत पर बातें कर रहे थे! 'अब मेरा आख़िरी वक़्त आ पहुंचा है! ये अमानातें तुम्हारे हवाले करता हूँ! इस अमानत का हक़ हर हाल में अदा करते रहना!
फिर और कई नसीहतें फ़रमायी और आपको रुख्सत किया! विसाल से कुछ दिन पहले आपने बड़े साहबज़ादे हज़रत ख़्वाजा सैयद फखरुद्दीन र०अ० को नसीहत फरमायीं:'दुनिया की सभी चीज़े मिटने वाली और फ़ना होने वाली हैं! हर वक़्त ख़ुदा की पनाह व खुशनूदी मांगते रहना और किसी चीज़ पर भरोसा न रखना, तक्लीफ़ और मुसीबत के वक़्त सब्र व हिम्मत का दामन हाथ से न छोड़ना!'
६३३ हिजरी में पांच और छ: रजब की दार्मियानी रात को हमेशा की तरह इशा की नमाज़ के बाद आप अपने हुजरे में गए और अन्दर से दरवाज़ा बन्द करके यादे ख़ुदा में लग गए! रात भर दरूद शरीफ़ और ज़िक्र की आवाज़ आती रही! सुबह होने से पहले यह आवाज़ आना बन्द हो गयी! आख़िरकार मजबूर होकर दरवाज़ा तोड़कर अन्दर गए तो देखा कि आपकी रूहे मुबारक परवाज़ कर चुकी थी और आपकी नूरानी पेशानी पर सब्ज़ (हरा) और रोशन शब्दों में लिखा हुआ है:
'हाज़ा हबीबुल्लाहि मा-त फ़ी हुब्बिल्लाहि'
'इन्नालिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन'
(यह अल्लाह के हबीब थे, अल्लाह की मुहब्बत में वफ़ात पाई)
आपका आस्ताना-ए-मुबारक पूरे हिन्दुस्तान का रूहानी मरकज़ बना हुआ है और इन्शाअल्लाह क़ियामत तक बना रहेगा!
  • अख्लाक़ व आदात:
आप बड़े ही नर्म दिल ख़ुश मिजाज और मिलनसार थे! जब किसी से बात करते तो मुस्करा देते, आपकी ज़िन्दगी बहुत सादा लेकिन दिलकश थी! जो कोई मिलने आता तो बहुत ख़ुशी और गर्मजोशी से मिलते, इज्ज़त से बिठाते और उनके रंज व ग़म में शरीक होते!
सख़ावत आपके ख़ानदान की ख़ासियत थी! बचपन में ही आपने अपना कुल माल व दौलत ख़ुदा की राह में फ़क़ीरों व अनाथों में बांट दी थी और बाद में जो कुछ नज़राना तोहफ़े आया करते थे वह सब भी अल्लाह के नाम पर ज़रुरतमंदों को दे दिया करते थे! आप बड़े नर्म मिज़ाज थे! सलाम में हमेशा सबक़त (पहल) किया करते थे, आदाबे शरीअत का हमेशा लिहाज़ रखते थे और सुन्नते नबवी स०अ०स० का हर वक़्त ध्यान रखते थे!
  • इबादत व रियाज़त:
आपका ज़्यादातर वक़्त इबादत और अल्लाह की याद में गुज़रता था! कुरआन शरीफ़ पढ़ना आपको बहुत पसन्द था! एक दिन में दो-दो बार कुरआन शरीफ़ ख़त्म कर लिया करते थे! अक्सर सुबह के वुज़ू से इशा की नमाज़ पढ़ते थे! नमाज़ और रोज़े के बड़े पाबन्द थे! रात का ज़्यादा हिस्सा नफ्ल पढ़ने में गुज़रता था, अक्सर व बेशतर रातों में इशा के वुज़ू से आपने फ़ज्र की नमाज़ अदा फ़रमाई! सारी उम्र में बहुत कम ऐसा हुआ है कि जिसमें आप रोज़े से न रहे हों! अक्सर आप लगातार एक-एक हफ़्ते तक रोज़ा रखते थे! और जौ की सूखी रोटी से जो वज़न में पांच मिसकाल से ज़्यादा न होती थी इफ़्तार किया करते थे! आपकी आंखों की तासीर का यह आलम था कि आपकी नज़र जिस गुनाहगार पर पड़ती वह आपसे अक़ीदत रखने लगता और फिर कभी गुनाह के पास न जाता!
  • अल्लाह के ध्यान में मग्न:
हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र०अ० पर अक्सर ऐसा होता था कि अल्लाह तआला की याद में इस तरह मग्न हो जाते कि और कुछ ख़बर न रहा करती थी! आख़िरी वक़्त में ध्यान व ज्ञान की कैफ़ियत बेहद बढ़ गयी थी! नमाज़ के वक़्त ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख्तियार काकी र०अ० सामने खड़े होकर उंची आवाज़ में 'सलात सलात' पुकारते, आप फिर भी होश में न आते तो कान में सलात पुकारते! इस पर भी आप न हिलते तो आपका शाना (कन्धा) मुबारक हिलाया जाता, उस वक़्त आप आंख खोलकर इर्शाद फ़रमाते: 'रसूलुल्लाह स०अ०स० की शरीअत से छुटकारा नहीं!' जब आप पर यह हालत ज़्यादा होती तो हुजरे का दरवाज़ा अन्दर से बन्द कर लेते और यादे इलाही में मशगूल हो जाते! उस वक़्त ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन या हमीदुद्दीन नागौरी र०अ० हुजरे के दरवाज़े पर पत्थर के टुकड़े डाल देते और ख़ुद हुजरे के पीछे चले जाते! जिस वक़्त हुज़ूर बाहर निकलते और आपकी नज़रे जलाली उन टुकड़ों पर पड़ती तो वह जल कर ख़ाक हो जाते!

  • कश्फ़:
एक रोज़ बुज़ुर्गों की मज्लिस में ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र०अ० ने कश्फ़ (ध्यान मग्न) से मालूम किया कि बुज़ुर्गों में एक दुरवेश बहुत भूके हैं और शर्म की वजह से कुछ भी न कह सकते थे, बस आपने मुसल्ले के नीचे हाथ डाला और चार जौ की रोटियां निकालकर उस दुरवेश के सामने रख दीं!
  • लंगर खाना:
हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र०अ० ने उस हालात में जबकि आपकी आमदनी का कोई ज़रिया नहीं था लंगर खाना जारी किया और आपके लंगर खाने में इस क़दर ज्यादा खाना पकता था कि सभी शहर के गरीब व लाचार पेट भरकर खाते पीते थे! लंगर खाने के दारोग़ा को आपने हुक्म दे रखा था कि जब और जिस क़दर खर्च की ज़रुरत हो मांग लिया करे! रोजाना सुबह के वक़्त जब दारोग़ा उस ग़रज़ से हाज़िर होता तो आप अपने मुसल्ले का दामन उठाकर उससे फ़रमाते हैं कि जिस क़दर ख़र्च की ज़रुरत हो इस ख़ज़ाने ग़ैब से लेलो! खुद रोज़ा रखते और जौ की रोटी जो वज़न में पांच मिसकाल से ज़्यादा नहीं होती थी, रोज़ा खोलते थे!
  • ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र०अ० के कुछ इर्शादात (कथन):
१. फ़क़ीरी का मुस्तहिक़ (लायक़) वह शख्स होता है जो दुनिया-ए-फ़ानी में अपने पास कुछ न रखे!
२. ख़ुदा की शनाख्त (पहचान) उस शख्स को होगी जो दुनिया वालों से अलग रहे और खुद को बड़ा न समझे!
३. खामोश और ग़मगीन रहना आरिफों की एक अलामत है!
४. पूरी दुनिया और कायनाते आलम को अपनी दो उंगलियों में देखना इरफ़ान का एक दर्जा है!
५. बुज़ुर्ग वह है जो अपना दिल दोनों जहां से उठा ले और हरदम आलमे ग़ैब से लाखों तजल्लियां उस पर ज़ाहिर हों और अल्लाह की राह में वह अल्लाह तआला के सिवा किसी से मदद न चाहे!
६. नमाज़ मोमिनीन को अल्लाह तआला से मिलायेगी, इसकी हिफ़ाज़त पूरी तरह करनी चाहिए!
७. जो शख्स पांचों वक़्त पाबन्दी के साथ नमाज़ अदा करता है क़ियामत के दिन उसकी नमाज़ उसकी हिफ़ाज़त और निगहबानी करेगी!
८. पांच चीज़ों का देखना इबादत है, चाहे वे चीज़े अलग-अलग क्यों न देखी जायें:
(१) मां-बाप का देखना
(२) कुरआन मजीद का देखना
(३) अल्लाह वालों का देखना
(४) खाना-ए-काबा का देखना
(५) अपने पीरे तरीकत का देखना
९. चार काम नफ्स के लिए ज़ीनत है:
(१) भूखे को खाना खिलाना!
(२) मुसीबत ज़दा की मदद करना!
(३) ज़रुरतमन्दों की ज़रुरत पूरी करना!
(४) दुश्मन से मेहरबानी और अच्छे सुलूक से पेश आना!
१०. नेक काम करने से बेहतर नेकों की सोहबत और बुरे काम करने से बदतर बुरों की सोहबत है!
११. हर दौर में दुनिया के अन्दर ख़ुदा के सैकड़ों ऐसे मक्बूल व प्यारे बन्दे होते हैं जिन्हें कोई नहीं जानता और वह गुमनामी के गोशे में इंतिक़ाल फरमा जाते हैं! दुनिया को औलियाओं से ख़ाली मत समझो!
१२. बुज़ुर्गी की निशानी यह है कि ख़ुदा के सिवा तमाम चीज़ों की मुहब्बत दिल से निकाल दे!
१३. राहे मुहब्बत में जीत उसकी होती है जो दोनों जहान से बेताल्लुक़ हो जाये!
१४. तवक्कुल यह है कि लोगों के रंज व मुसीबत उठाए और किसी से शिकायत और इज़्हार न करे!
१५. जितना ज़्यादा अल्लाह में ध्यान होगा उतना ही ज़्यादा हैरत बढ़ेगी!
१६. आरिफ़ मौत को दोस्त, आराम को दुश्मन और अल्लाह के ज़िक्र को प्यारा रखते हैं!
१७. मुहब्बत में अदना दर्जा यह है कि अल्लाह कि सिफ़ात उसमें दिखाई दे और आला दर्जा यह है कि अगर उस पर कोई दावा करे तो उसको उलटा मुजरिम बना दे! कोई शख्स इबादत से अल्लाह का कुर्ब (निकटता) हासिल नहीं कर सकता जब तक नमाज़ न पढ़े क्योंकि नमाज़ ही बन्दे को अल्लाह से मिलाएगी!
१८. चार खूबियां नफ्स की जौहर है:
(१) ग़रीबी में अमीरी का इज़्हार करना!
(२) भूख के वक़्त सेरी का इज़्हार करना!
(३) ग़म के वक़्त ख़ुश रहना!
(४) दुश्मन के साथ दोस्ती करना!
१९. झूठी क़सम खाने वाले के घर से बरकत जाती रहती है और वह बर्बाद हो जाता है!
२०. आरिफ़ वही है जिसमे तीन बातें पायी जाएं
(१) खौफे ख़ुदा,(२) ताज़ीम,(३) हया
२१. ख़ुदा-ए-तआला ने किसी इबादत के बारे में इतनी ताकीद नहीं फरमाई जितनी नमाज़ के लिए!
२२. जिस क़दर दिल लगाकर और सुकून से नमाज़ अदा करोगे उतना ही ख़ुदा तआला की नज़दीकी हासिल होगी!
२३. जो शख्स इबादत नहीं करता वह हराम रोज़ी खाता है!
२४. इल्मे दीन हासिल करना हर मुसलमान मर्द औरत का फ़र्ज़ है!
२५. आदमी का अख़लाक़ ज़बान में छुपा हुआ है!
२६. हमको नफरत दूसरों से नहीं बल्कि अपने गुनाहों से करना चाहिए!
२७. इंसान मुस्कुराहट के ज़रिये दूसरों के दिलों की नफरत मिटा सकता है!
२८. तअज्जुब है उसपर जो दुनिया को फानी जानते हुए भी उससे मोहब्बत करता है!
२९. इल्म के बगैर इंसान अधूरा है!
३०. गुनाह किसी ना किसी सूरत में दिल को बैचेन करता है!
३१. जो शख्स इल्म की मुसीबत नहीं झेलता उसे हमेशा जहालत की जिल्लत झेलना पड़ती है!
३२. इंसान का दिल तोड़ने वाला शख्स अल्लाह को नहीं पा सकता!
  • ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र० अ० के हौसले और इरादे:
यकीं मुहकम, अमल पैहम, मुहब्बत फ़ातहे आलम,
जिहादे ज़िन्दगानी में यह हैं मर्दों की शमशीरें!
हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र०अ० ने हिन्दुस्तान में एक ज़बरदस्त रूहानी और समाजी इंक़िलाब को जन्म दिया! छूत-छात के इस भयानक माहौल में इस्लाम का नज़रिया-ए-तौहीद अमली रूप में पेश किया और बताया कि यह सिर्फ एक ख्याली चीज़ नहीं है, बल्कि ज़िन्दगी का एक ऐसा उसूल है जिसको मानने के बाद ज़ात-पात की सब उंच-नीच बेमायना हो जाती है! यह एक ज़बरदस्त दीनी और समाजी इंक़िलाब का एलान था!
उन दिनों, अजमेर राजपूत साम्राज्य का मजबूत केन्द्र और हिन्दुओं का धार्मिक गढ़ था! दूर-दूर से हिन्दू अपनी धार्मिक रस्मों को पूरी करने के लिए वहां जमा होते थे! एक ऐसे ज़बरदस्त राजनैतिक और धार्मिक केन्द्र में रहने का फ़ैसला, न सिर्फ़ ख़्वाजा साहब र०अ० के पक्के इरादे को बताता है, बल्कि उनकी ग़ैर मामूली ख़ुद एतमादी का आईनादार है!

    14 September, 2011

    पैग़म्बर ए इस्लाम हज़रत मोहम्मद (स.अ.व) के कुछ कथन:

    1.       आदमी जैसे जैसे बूढ़ा होता जाता है उसकी हिरस व तमन्नाएं जवान होती जाती हैं।
    2.       अगर मेरी उम्मत के आलिम व हाकिम फ़ासिद होंगे तो उम्मत फ़ासिद हो जायेगी और अगर यह नेक होंगें तो उम्मत नेक होगी।
    3.       तुम सब, आपस में एक दूसरे की देख रेख के ज़िम्मेदार हो।
    4.       माल के ज़रिये सबको राज़ी नही किया जा सकता, मगर अच्छे अख़लाक़ के ज़रिये सबको ख़ुश रखा जा सकता है।
    5.       नादारी एक बला है, जिस्म की बीमारी उससे बड़ी बला है और दिल की बीमारी (कुफ़्र व शिर्क) सबसे बड़ी बला है।
    6.       मोमिन हमेशा हिकमत की तलाश में रहता है।
    7.       इल्म को बढ़ने से नही रोका जा सकता।
    8.       इंसान का दिल, उस “ पर ” की तरह है जो बयाबान में किसी दरख़्त की शाख़ पर लटका हुआ हवा के झोंकों से ऊपर नीचे होता रहता है।
    9.       मुसलमान, वह है, जिसके हाथ व ज़बान से मुसलमान महफ़ूज़ रहें।
    10.   किसी की नेक काम के लिए राहनुमाई करना भी ऐसा ही है, जैसे उसने वह नेक काम ख़ुद किया हो।
    12.   माँ के क़दमों के नीचे जन्नत है।
    13.   औरतों के साथ बुरा बर्ताव करने में अल्लाह से डरों और जो नेकी उनके शायाने शान हो उससे न बचो।
    14.   तमाम इंसानों का रब एक है और सबका बाप भी एक ही है, सब आदम की औलाद हैं और आदम मिट्टी से पैदा हुए है लिहाज़ तुम में अल्लाह के नज़दीक सबसे ज़्यादा अज़ीज़ वह है जो तक़वे में ज़्यादा है।
    15.   ज़िद, से बचो क्योंकि इसकी बुनियाद जिहालत है और इसकी वजह से शर्मिंदगी उठानी पड़ती है।
    16.   सबसे बुरा इंसान वह है, जो न दूसरों की ग़लतियों को माफ़ करता हो और न ही दूसरों की बुराई को नज़र अंदाज़ करता हो, और उससे भी बुरा इंसान वह है जिससे दूसरे इंसान न अमान में हो और न उससे नेकी की उम्मीद रखते हों।
    17     ग़ुस्सा न करो और अगर ग़ुस्सा आ जाये, तो अल्लाह की क़ुदरत के बारे में ग़ौर करो।
    18     जब तुम्हारी तारीफ़ की जाये, तो कहो, ऐ अल्लाह ! तू मुझे उससे अच्छा बना दे जो ये गुमान करते है और जो यह मेरे बारे में नही जानते उसको माफ़ कर दे और जो यह कहते हैं मुझे उसका मसऊल क़रार न दे।
    19     चापलूस लोगों के मूँह पर मिट्टी मल दो। (यानी उनको मुँह न लगाओ)
    20     अगर अल्लाह किसी बंदे के साथ नेकी करना चाहता है, तो उसके नफ़्स को उसके लिए रहबर व वाइज़ बना देता है।
    21     मोमिन हर सुबह व शाम अपनी ग़लतियों का गुमान करता है।
    22     आपका सबसे बड़ा दुश्मन नफ़्से अम्मारह है, जो ख़ुद आपके अन्दर छुपा रहता है।
    23     सबसे बहादुर इंसान वह हैं जो नफ़्स की हवा व हवस पर ग़ालिब रहते हैं।
    24     अपने नफ़्स की हवा व हवस से लड़ो, ताकि अपने वुजूद के मालिक बने रहो।
    25     ख़ुश क़िस्मत हैं, वह लोग, जो दूसरों की बुराई तलाश करने के बजाये अपनी बुराईयों की तरफ़ मुतवज्जेह रहते हैं।
    26     सच, से दिल को सकून मिलता है और झूट से शक व परेशानियाँ बढ़ती है।
    27     मोमिन दूसरों से मुहब्बत करता है और दूसरे उससे मुहब्बत करते हैं।
    28     मोमेनीन आपस में एक दूसरे इसी तरह वाबस्ता रहते हैं जिस तरह किसी इमारत के तमाम हिस्से आपस में एक दूसरे से वाबस्ता रहते हैं।
    29     मोमेनीन की आपसी दोस्ती व मुब्बत की मिसाल जिस्म जैसी है जब ज़िस्म के एक हिस्से में दर्द होता है तो पर बाक़ी हिस्से भी बे आरामी महसूस करते हैं।
    30     तमाम इंसान कंघें के दाँतों की तरह आपस में बराबर हैं।
    31     इल्म हासिल करना तमाम मुसलमानों पर वाजिब है।
    32     फ़कीरी, जिहालत से, दौलत, अक़्लमंदी से और इबादत, फ़िक्र से बढ़ कर नही है।
    33     झूले से कब्र तक इल्म हासिल करो।
    34     इल्म हासिल करो चाहे वह चीन में ही क्योँ न हो।
    35     मोमिन की शराफ़त रात की इबादत में और उसकी इज़्ज़त दूसरों के सामने हाथ न फैलाने में है।
    36     साहिबाने इल्म, इल्म के प्यासे होते है।
    37     लालच इंसान को अंधा व बहरा बना देता है।
    39     परहेज़गारी, इंसान के ज़िस्म व रूह को आराम पहुँचाती है।
    40     अगर कोई इंसान चालीस दिन तक सिर्फ़ अल्लाह के लिए ज़िन्दा रहे, तो उसकी ज़बान से हिकमत के चश्मे जारी होंगे।
    41     मस्जिद के गोशे में तन्हाई में बैठने से ज़्यादा अल्लाह को यह पसंद है, कि इंसान अपने ख़ानदान के साथ रहे।
    42     आपका सबसे अच्छा दोस्त वह है, जो आपको आपकी बुराईयों की तरफ़ तवज्जोह दिलाये।
    43     इल्म को लिख कर महफ़ूज़ करो।
    44     जब तक दिल सही न होगा, ईमान सही नही हो सकता और जब तक ज़बान सही नही होगी दिल सही नही हो सकता।
    46     तन्हा अक़्ल के ज़रिये ही नेकी तक पहुँचा जा सकता है लिहाज़ा जिनके पास अक़्ल नही है उनके पास दीन भी नही हैं।
    47     नादान इंसान, दीन को, उसे तबाह करने वाले से ज़्यादा नुक़्सान पहुँचाते हैं।
    48     मेरी उम्मत के हर अक़्लमंद इंसान पर चार चीज़ें वाजिब हैं। इल्म हासिल करना, उस पर अमल करना, उसकी हिफ़ाज़त करना और उसे फैलाना।
    49     मोमिन एक सुराख़ से दो बार नही डसा जाता।
    50     मैं अपनी उम्मत की फ़क़ीरी से नही, बल्कि बेतदबीरी से डरता हूँ।
    51     अल्लाह ज़ेबा है और हर ज़ेबाई को पसंद करता है।
    52     अल्लाह, हर साहिबे फ़न मोमिन को पसंद करता।
    53     मोमिन, चापलूस नही होता।
    54     ताक़तवर वह नही,जिसके बाज़ू मज़बूत हों, बल्कि ताक़तवर वह है जो अपने ग़ुस्से पर ग़ालिब आ जाये।
    56     सबसे अच्छा घर वह है, जिसमें कोई यतीम इज़्ज़त के साथ रहता हो।
    57     कितना अच्छा हो, अगर हलाल दौलत, किसी नेक इंसान के हाथ में हो।
    58     मरने के बाद अमल का दरवाज़ा बंद हो जाता है,मगर तीन चीज़े ऐसी हैं जिनसे सवाब मिलता रहता है, सदक़-ए-जारिया, वह इल्म जो हमेशा फ़ायदा पहुँचाता रहे और नेक औलाद जो माँ बाप के लिए दुआ करती रहे।
    59     अल्लाह की इबादत करने वाले तीन गिरोह में तक़सीम हैं। पहला गिरोह वह है जो अल्लाह की इबादत डर से करता है और यह ग़ुलामों वाली इबादत है। दूसरा गिरोह वह जोअल्लाह की इबादत इनाम के लालच में करता है और यह ताजिरों वाली इबादत है। तीसरा गिरोह वह है जो अल्लाह की इबादत उसकी मुहब्बत में करता है और यह इबादत आज़ाद इंसानों की इबादत है।
    60     ईमान की तीन निशानियाँ हैं, तंगदस्त होते हुए दूसरों को सहारा देना, दूसरों को फ़ायदा पहुँचाने के लिए अपना हक़ छोड़ देना और साहिबाने इल्म से इल्म हासिल करना।
    61     अपने दोस्त से दोस्ती का इज़हार करो ताकि मुब्बत मज़बूत हो जाये।
    62     तीन गिरोह दीन के लिए ख़तरा हैं, बदकार आलिम, ज़ालिम इमाम और नादान मुक़द्दस।
    63     इंसानों को उनके दोस्तों के ज़रिये पहचानों, क्योँकि हर इंसान अपने हम मिज़ाज़ इंसान को दोस्त बनाता है।
    64     गुनहाने पिनहनी (छुप कर गुनाह करना) से सिर्फ़ गुनाह करने वाले को नुक़्सान पहुँचाता है लेकिन गुनाहाने ज़ाहिरी (खुले आम किये जाने वाले गुनाह) पूरे समाज को नुक़्सान पहुँचाते है।
    65     दुनिया के कामों में कामयाबी के लिए कोशिश करो मगर आख़ेरत के लिए इस तरह कोशिश करो कि जैसे हमें कल ही इस दुनिया से जाना है।
    66     रिज़्क़ को ज़मीन की तह में तलाश करो।
    67     अपनी बड़ाई आप बयान करने से इंसान की क़द्र कम हो जाती है और इनकेसारी से इंसान की इज़्ज़त बढ़ती है।
    68     ऐ अल्लाह ! मेरी ज़्यादा रोज़ी मुझे बुढ़ापे में अता फ़रमाना।
    69     बाप पर बेटे के जो हक़ हैं उनमें से यह भी हैं कि उसका अच्छा नाम रखे, उसे इल्म सिखाये और जब वह बालिग़ हो जाये तो उसकी शादी करे।
    70     जिसके पास क़ुदरत होती है, वह उसे अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करता है।
    71     सबसे वज़नी चीज़ जो आमाल के तराज़ू में रखी जायेगी वह ख़ुश अखलाक़ी है।
    72     अक़्लमंद इंसान जिन तीन चीज़ों की तरफ़ तवज्जोह देते हैं, वह यह हैं ज़िंदगी का सुख, आखेरत का तोशा (सफ़र में काम आने वाले सामान) और हलाल ऐश।
    73     ख़ुश क़िसमत हैं, वह इंसान, जो ज़्यादा माल को दूसरों में तक़सीम कर देते हैं और ज़्यादा बातों को अपने पास महफ़ूज़ कर लेते हैं।
    74     मौत हमको हर ग़लत चीज़ से बे नियाज़ कर देती है।
    75     इंसान हुकूमत व मक़ाम के लिए कितनी हिर्स करता है और आक़िबत में कितने रंज व परेशानियाँ बर्दाश्त करता है।
    76     सबसे बुरा इंसान, बदकार आलिम होता है।
    77     जहाँ पर बदकार हाकिम होंगे और जाहिलों को इज़्ज़त दी जायेगी वहाँ पर बलायें नाज़िल होगी।
    78     लानत हो उन लोगों पर जो अपने कामों को दूसरों पर थोपते हैं।
    79     इंसान की ख़ूबसूरती उसकी गुफ़्तुगू में है।
    80     इबादत की सात क़िस्में हैं और इनमें सबसे अज़ीम इबादत रिज़्क़े हलाल हासिल करना है।
    81     समाज में आदिल हुकूमत का पाया जाना और क़ीमतों का कम होना, इंसानों से अल्लाह के ख़ुश होने की निशानी है।
    82     हर क़ौम उसी हुकूमत के काबिल है जो उनके दरमियान पायी जाती है।
    83     ग़लत बात कहने से कीनाह के अलावा कुछ हासिल नही होता।
    85     जो काम बग़ैर सोचे समझे किया जाता है उसमें नुक़्सान का एहतेमाल पाया जाता है।
    87     दूसरों से कोई चीज़ न माँगो, चाहे वह मिस्वाक करने वाली लकड़ी ही क्योँ न हो।
    88     अल्लाह को यह पसंद नही है कि कोई अपने दोस्तों के दरमियान कोई खास फ़र्क़ रखे।
    89     अगर किसी चीज़ को फाले बद समझो, तो अपने काम को पूरा करो, अगर कोई किसी बुरी चीज़ का ख़्याल आये तो उसे भूल जाओ और अगर हसद पैदा हो तो उससे बचो।
    90     एक दूसरे की तरफ़ मुहब्बत से हाथ बढ़ाओ क्योँकि इससे कीनह दूर होता है।
    91     जो सुबह उठ कर मुसलमानों के कामों की इस्लाह के बारे में न सोचे वह मुसलमान नही है।
    92     ख़ुश अख़लाकी दिल से कीनह को दूर करती है।
    93     हक़ीक़त कहने में, लोगों से नही डरना चाहिए।
    94     अक़लमंद इंसान वह है जो दूसरों के साथ मिल जुल कर रहे।
    95     एक सतह पर ज़िंदगी करो ताकि तुम्हारा दिल भी एक सतह पर रहे। एक दूसरे से मिलो जुलो ताकि आपस में मुहब्बत रहे।
    96     मौत के वक़्त, लोग पूछते हैं कि क्या माल छोड़ा और फ़रिश्ते पूछते हैं कि क्या नेक काम किये।
    97     वह हलाल काम जिससे अल्लाह को नफ़रत है, तलाक़ है।
    98     सबसे बड़ा नेक काम, लोगों के दरमियान सुलह कराना।
    99     ऐ अल्लाह तू मुझे इल्म के ज़रिये बड़ा बना, बुर्दुबारी के ज़रिये ज़ीनत दे, परहेज़गारी से मोहतरम बना और तंदरुस्ती के ज़रिये खूबसूरती अता कर।